सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 91.pdf/२७२

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

भाग लेने का अवसर देती है। आखिरकार, क्या यह काफी नहीं है कि वे लोग जो सरकार के साथ सक्रिय रूप से सहयोग कर रहे हैं, अर्थात् खिताबधारी, स्कूल में पढ़नेवाले बच्चों के माता–पिता और वकील, अपना समर्थन देना बन्द कर दें? इन स्वेच्छा से समर्थन देने वालों पर ही सरकार की नैतिक शक्ति निर्भर करती है और इस नैतिक शक्ति के जाते ही उसकी बुनियाद हिल जायेगी। मैं सिद्धान्त रूप में विदेशी माल का बहिष्कार करने के विरुद्ध नहीं हूं। मैंने उसका विरोध किया है क्योंकि भौतिक रूप से ऐसा करना असम्भव है। मैंने एक विशिष्ट प्रकार के बहिष्कार यानी विदेशी कपड़ों के बहिष्कार का सुझाव पेश किया है। आज वह सम्भव हैं और यदि हम विदेशी कपड़ों का बहिष्कार कर सकें तो हम भारत को आर्थिक रूप से स्वतन्त्र बनायेंगे। मेरे खयाल से इस पत्र में आपके उठाये सभी प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं।

हृदय से आपका

अंग्रेजी की फोटो–नकल (एस॰ एन॰ ७२७४) से

२५६. पत्र : मदनमोहन मालवीय को

भिवानी
२२ अक्तूबर, [१९२०][]

प्रिय पण्डितजी,

मैं यह पत्र जान–बूझ कर अंग्रेजी में लिख रहा हूं, क्योंकि मेरा विश्वास है कि सम्भवतः मेरी अंग्रेजी [मेरी] हिन्दी की अपेक्षा अधिक सुस्पष्ट है। मैंने आपको एक तार देहरादून भेजा था जिसकी एक नकल संलग्न है। वहां से बताया गया कि आप देहरादून में नहीं मिले। उसके बाद ही बख्शी टेकचन्द से ज्ञात हुआ कि आप शिमला जा चुके हैं। आप परिषदों के बारे में निश्चित कदम उठा चुके हैं, इसे देखते हुए क्या यह सम्भव नहीं कि आप हिन्दू विश्वविद्यालय[] के सम्बन्ध में भी वैसा ही करें। मैं जानता हूं कि ऐसा करना, कहीं ज्यादा मुश्किल है। और उसकी कीमत भी अपेक्षाकृत अधिक भारी होगी। क्या मौजूदा सरकार राक्षस राज्य का प्रतिनिधित्व करती है, और यदि ऐसा है तो क्या हम अपने बच्चों को रावण के अधीन या उसके प्रभाव के अन्तर्गत चलनेवाले स्कूलों में पढ़ने भेज सकते हैं? सम्भवतः मेरा समूचा तर्क यही है। यदि मेरा तर्क निर्णायक नहीं है तो आपके लिए यह सम्भव नहीं है कि आप चार्टर को फाड़ डालें। तो मुझे आशा है कि आप बुरा नहीं मानेंगे यदि मैं सेण्ट्रल हिन्दू कॉलेज और विश्वविद्यालय के अन्तर्गत चलनेवाली अन्य संस्थाओं के लड़कों से कॉलेज छोड़ने को कहूं। यदि आप सम्भवतः मेरा सुझाया कदम उठाते हैं, तो इसका यह अर्थ होना जरूरी नहीं कि यदि न्यासी विश्वविद्यालय की स्वतन्त्रता घोषित करते हैं तो आपको वहां की भूमि या इमारत ही छोड़ना पड़े। और यह अर्थ भी नहीं है कि सरकार द्वारा

  1. गांधीजी २२ अक्तूबर, १९२० को भिवानी में थे।
  2. बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, जिसके संस्थापक मदनमोहन मालवीय थे।
२३२