२८२. पत्र : मगनलाल गांधी को
[१८ अगस्त, १९२१ के पश्चात्][१]
तुम्हारी दीर्घायु की कामना करने से क्या लाभ?
मैं तो चाहता हूं कि तुम अधिक–से–अधिक उन्नति करो। शरीर रहे न रहे पर आत्मा का विकास या ह्रास तो होता है। तुम्हारे निरोग आरोग्य वृद्धि की कामना मैं अवश्य करता हूं। लेकिन वह तभी सम्भव है जब तुम बिलकुल निश्चिन्त और निर्भय होगे। अभी ऐसा समय आ रहा है, जैसे–जैसे तुम जीवन में सुव्यवस्थित होते जाओगे वैसे–वैसे उन्नति करोगे और तुम्हारा विश्वास बढ़ता जायेगा।
यदि हम आन्तरिक रूप से सत्य की खोज कर अहिंसा अर्थात् प्रेम का पालन करते रहें। और बाह्य रूप से धुनाई, कताई और बुनाई का विकास करते रहें—तो इससे अधिक हमें कुछ नहीं चाहिए। यदि स्वदेशी पर ही स्वराज्य और स्वधर्म निर्भर है तो हमें उत्तम धुनिया, कतैया, बुनकर और बढ़ई बनना चाहिए।
असम में अब जो कुछ मैं देख रहा हूं उससे पता लगता है कि हिन्दुस्तान क्या था और क्या हो गया।[२] इसीलिए 'नवजीवन' में करघे पर तुम्हारा लेख पढ़कर मुझे खुशी हुई। बुनाई, धुनाई और कताई का अधिक विकास करो और उसे अधिक शास्त्रीय बनाओ। दूसरे लोग दूसरा काम करेंगे। मगर जो लोग जिस काम में निपुण हों उन्हें उसी में रोक लो ।
यदि कुछ विशेष मकान बनाने हैं तो हम कांग्रेस से पैसा नहीं लेंगे। वह दूसरी जगह से मिल जायेगा। कितना खर्च करना चाहिए, वह मुझे बताना और काम शुरू कर देना।
क्या प्यारेलाल रसोई के काम से छुटकारा पा सकते हैं?[३] और यदि हां तो किस प्रकार? इसका जवाब हरिलाल के द्वारा कलकत्ता भेज सकते हो। प्रभुदास मेरे साथ हैं और एक बंगाली सज्जन और जमनालाल भी हैं। वे मेरे असम के दौरे पर साथ रहेंगे।
बापू के आशीर्वाद
गुजराती की नकल से: छगनलाल गांधी पेपर्स। सौजन्य : साबरमती संग्रहालय, अहमदाबाद