२८३. पत्र : शंकरलाल बैंकर को
मरदान
२४ अगस्त, १९२१
आपको लिखने का कई बार सोचा पर लिख नहीं सका। आज मेरे पास थोड़ा समय है।
असम में स्वदेशी का बहुत काम हो सकता है पर वहां के लोग आलसी हैं। वहां की स्त्रियां भी बहुत अच्छी बुनकर है, मगर वे अपनी जरूरत से अधिक बुनना नहीं चाहतीं। उन्होंने कातना छोड़ दिया था, पर अब शुरू कर दिया है।
वहां काम काफी जोरों से चल रहा होगा। जिन्होंने चन्दा देने के लिए नाम लिखवाये हैं उनसे पैसे ले लेना।
जयकर की अनुमति से हमने उसके २५,००० रुपये 'इंडीपेन्डेन्ट' के लिए रख लिये हैं। अगर भाई उमर के पैसों में २५,००० रुपये रख सकते हैं तो हम उसकी [इंडीपेन्डेन्ट की] चिन्ता से मुक्त हो जायेंगे। जो ठीक लगे वैसा करके ५०,००० रुपये मोतीलालजी को भेजने जरूरी हैं।
मुझे यहां जमनालालजी की बहुत मदद मिल रही है। यहां मारवाड़ी बहुत बड़ी संख्या में हैं। वे सब विदेशी कपड़े का व्यापार करते हैं। उनमें से बहुतों ने ऐसा न करने की प्रतिज्ञा ली है।
जमनालालजी चाहते हैं कि कलकत्ता में मैं कम-से-कम १० दिन बिताऊं। इस हिसाब से तो ऐसा लगता है कि १२ तारीख से पहले मैं कलकत्ता नहीं छोड़ सकता।
मेरे प्रवास का कार्यक्रम निम्नलिखित है :
| २५–३० | सिलचर, सिलहट आदि |
| ३१–१ | चटगांव |
| २–३ | बारीसाल |
| ४–१२ | कलकत्ता (४ पोलक स्ट्रीट)[१] |
अपनी तबीयत के बारे में लिखना और वहां की स्थिति की मुझे जानकारी देना।
मोहनदास के वन्देमातरम्
मूल गुजराती (एस॰ एन॰ ३२६८९) से
- ↑ यह अंग्रेजी लिपि में है।