३०५. पत्र : पद्मजा नायडू को
२६ दिसम्बर, [१९२१][१]
तुम्हें अहमदाबाद में न पाकर मुझे हैरानी हुई। यदि तुम स्वतन्त्रता संग्राम में अपने हिस्से की सेवा करना चाहती हो तो तुम्हें होशियार, दृढ़ और फुर्तीली बनना होगा।
सप्रेम।
हृदय से तुम्हारा
मो॰ क॰ गांधी
गोल्डन थ्रेशोल्ड
हैदराबाद
मूल अंग्रेजी से : पद्मजा नायडू पेपर्स। सौजन्य : नेहरू–स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय
३०६. पत्र : दयालजी तथा कल्याणजी मेहता को
[शुक्रवार, १९२१][३]
कल ही तुम्हें पत्र लिखा। सुबह का समय है। मैंने संलग्न पत्र पढ़ लिया है। उसे तुम दोनों को पढ़ने के लिए भेज रहा हूं। उसमें शायद अतिशयोक्ति होगी लेकिन बिलकुल गलत तो नहीं लगता। फिर भी, तुम दोनों इसे खूब ध्यान से पढ़ना। हमें ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए। जो अनुचित हो। इस पत्र के लेखक के प्रति मन में भी रोष न करना। उसने जो कुछ लिखा है यदि वह निरा सत्य है तो उसे सत्याग्रही मानना चाहिए। यदि उसने बढ़ा–चढ़ा कर लिखा है और झूठ का सहारा लिया है तो वह दया का पात्र है। उसके प्रति हमारे मन में किसी प्रकार की कटुता नहीं होनी चाहिए और इसी कारण मैं दूसरों को नाम देने से मना कर रहा हूं।
मैं यहां आज और कल तक हूं। मैं यहां से शनिवार को चलूंगा। और वहां सुबह पहुंच जाऊंगा। सोमवार को मैं वहीं रहूंगा फिर मंगलवार भी है। यदि कोई परिवर्तन हुआ तो मैं तुम्हें सूचना दे दूंगा। यदि तुम दोनों चाहते हो कि कार्य–समिति की बैठक बम्बई में हो तो ऐसा भी हो सकता है।
बापू के आशीर्वाद
गुजराती की फोटो–नकल (जी॰ एन॰ २६७२) से