इसलिए केवल मनोरंजन के लिए शिकार नहीं हो सकता। यदि कुछ खेल होने ही चाहिए तो गेंद–बल्ला है या उस जैसे कई खेल राजा के लिए भी हैं। शिकार धर्म के विरुद्ध है। यदि काठियावाड़ी इस धर्म सिद्धान्त पर टिके रहते हैं तो यह गर्व की बात होगी। लेकिन इस धार्मिक लड़ाई में दूसरे विषयों को न लायें तो अच्छा होगा।
यदि यह मुद्दा न उठाया गया होता तो ठीक होता, लेकिन अब उठाया गया है तो इसका समाधान भी होना चाहिए, परन्तु अब तो यह बात एक तरफ कर दी गई है।
एजेण्ट ने एक नया ही विवाद खड़ा कर दिया। ऐसे आदेश को कौन मानेगा कि क्षेत्र–विशेष के लोग इस क्षेत्र से अलग रहें? क्या २४ घंटों में ये काठियावाड़ी उस जगह को छोड़ सकते हैं? और यह बन्धन किसलिए? जो लोग काठियावाड़ में रहते हैं वे इस प्रकार नहीं जा सकते। और अब मणिलाल कोठारी तथा मनसुखलाल मेहता दोनों एजेण्ट साहब को विनयपूर्वक बता दें कि वे इस आदेश को मानने से इन्कार करते हैं। जिसका जहां जन्म हुआ है उसे वहां रहने का जन्मसिद्ध अधिकार है। हमें मालूम है कि इस क्षेत्र के राज्याधिकारियों ने अपने राज्य की हदबन्दी कर ली है तथा इस क्षेत्र में जन्मे लोगों को परेशान कर रहे हैं। लेकिन काठियावाड़ियों के लिए एजेण्ट साहब ने स्वयं ही ऐसी अनोखी स्थिति पैदा की है। उन दोनों कार्यकर्त्ताओं को इसके लिए जेल जाने दिया जाये। यदि अन्य काठियावाड़ी भी इस समस्या का समाधान करना चाहते हैं तो उन्हें भी जेल जाना चाहिए। एक क्षत्रिय पर यदि युद्ध थोपा जाये तो उसके लिए धर्म का प्रश्न है। और आज भारत में हम जिस कार्य में लगे हैं उसका एकमात्र उद्देश्य क्षत्रिय धर्म तथा ब्राह्मणत्व का पुनरुद्धार करना है। वैश्य तथा शूद्रों का धर्म कायम है। लेकिन शौर्य तथा ज्ञान के अभाव में वैश्यों का धर्म केवल व्यापार तक ही सीमित रह गया है तथा शूद्रों का सेवा–धर्म गुलामी बनकर रह गया है। जिसके परिणामस्वरूप चारों धर्मों का नाश हो गया है। क्षत्रिय का धर्म मारने में नहीं बल्कि निर्भय हो मृत्यु को वरण करने में है। मृत्यु के सम्मुख होने पर पलायन में नहीं है। ज्ञान का अर्थ है आत्म–अनात्म विवेक नश्वर शरीर से परे अपना अधिक–से–अधिक समय या पूरा समय शाश्वत आत्मा के ज्ञान में लगाना ज्ञान है तथा हर आत्मा विरुद्ध कार्य का आमरण विरोध करना शौर्य है। अपनी कुछ हद तक तो वैश्यों तथा शूद्रों में भी इन गुणों को होना चाहिए।
यदि काठियावाड़ी इन दो गुणों को अपने अन्दर आत्मसात करने के लिए तैयार हैं तो उन्हें इस लड़ाई से अलग नहीं रहना चाहिए। इसमें कोई बुराई नहीं है यदि वे केवल इस लड़ाई में ही अपना सारा ध्यान लगा दें। इससे बहुत लाभ होगा। कई काठियावाड़ियों को तो इस लड़ाई में अपनी जान तक दे देनी चाहिए। यदि लोभी काठियावाड़ी इस अप्रत्यक्ष लाभ से सन्तुष्ट नहीं होते। तो वे काठियावाड़ में 'पवित्र लड़ाई' शुरू कर सकते हैं। लेकिन उन्हें याद रहे कि इसके लिए काठियावाड़ में अनुकूल वातावरण नहीं है। और वह इस लड़ाई के लिए तैयार नहीं हैं।