काठियावाड़ के जंगलों में रास्तों की सुविधा नहीं है और काम कठिन है इसलिए अभी बहुत विवेकपूर्वक कार्य करना है। यदि वे राजा को ऐसी स्थिति में डाल देंगे तो हो सकता है कि दोनों पक्षों को इससे हानि हो। इसलिए मेरी सलाह तो यही होगी कि इस लड़ाई को अन्त तक जारी रखें तथा इस बड़ी लड़ाई में हर काठियावाड़ी अपना बलिदान देने को तैयार रहे। झील में हमेशा कुएं से ज्यादा पानी होता है। इसलिए बुद्धिमानी इसी में होगी कि वे यह सोचकर सन्तुष्ट हो जायें कि उन्होंने धैर्य का पालन किया है। परन्तु यदि वे काठियावाड़ में ही अपनी आर्थिक, नैतिक तथा राजनैतिक दशा सुधारने के लिए पवित्र लड़ाई शुरू करना चाहते हैं तो इसका उन्हें अधिकार है। मैं तो केवल एक बुद्धिमान बनिये की भांति भीरु, चतुर, तटस्थ तथा व्यवस्थित काठियावाड़ी विषय में लिख रहा हूं।
कोई भी काठियावाड़ी मुझे कह सकता है कि मैं पुराने काठियावाड़ की ओर देख रहा हूं और मुझे नवजीवन से भरपूर पुनर्जीवित काठियावाड़ के विषय में मालूम नहीं है। ऐसा हो सकता है लेकिन फिर मेरी बनिया वृत्ति मुझे यही सुझाव देती है कि मैं, जिसके हाथ में पूरे काठियावाड़ की बागडोर है, उन सबसे, जो इसके स्थूल तथा सूक्ष्म धागों को एक जैसा समझते हैं, ज्यादा अच्छी तरह जानता हूं।
यह चेतावनी देते हुए और यह मानकर कि मेरी बात सुनी जायेगी मेरी इच्छा है कि हर काठियावाड़ी अपने धर्म तथा सामर्थ्य के अनुसार अपने कर्त्तव्य का पालन करे और इसमें ईश्वर उनकी सहायता करे। यदि वे सफल होते हैं तो मुझ जैसा आलोचक उन्हें बधाई देगा और यदि वे गलती करते हैं, असफल होते हैं, हिम्मत हार जाते हैं तो मैं धृष्टतापूर्वक इस बात की याद दिलाऊंगा कि क्या ऐसा मैंने नहीं कहा था? और तब उनसे अलग खड़ा हो जाऊंगा। इसलिए सुनो सबकी लेकिन करो वही जो ठान लिया है। यही स्वराज्य का प्रथम, मध्यम तथा अन्तिम पाठ है। जो अपनी बुद्धि के अनुसार कार्य करता है, वह ईश्वर को जानता है तथा उससे डरता है।
मोहनदास गांधी
गुजराती की नकल (सी॰ डब्ल्यू॰ ११२८७) से