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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 91.pdf/३१४

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय


गुजरात के लिए दस लाख रुपये तो अवश्य भेज दें। वे हिसाब भेजेंगे।

मेरी यह मान्यता दिन–प्रतिदिन दृढ़ होती जा रही है कि खादी और चरखा प्रचार के अतिरिक्त दूसरी चीजों की जरूरत कम है।

मोहनदास के प्रणाम

मूल गुजराती से : प्यारेलाल पेपर्स। नेहरू–स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय। सौजन्य : बेलादेवी नैयर और डॉ॰ सुशीला नैयर

३१९. पत्र : बाबा लक्ष्मणदास को

[२१ मार्च, १९२२ के पश्चात्][]

चि॰ लक्ष्मणदास,

खान–पान के प्रयोगों से ही ब्रह्मचर्य की सफलता की आशा नहीं रखनी चाहिए। खान–पान के प्रयोग तो हैं ही। उन प्रयोगों के साथ मन का सहयोग भी चाहिए और राम नाम का जागरूक स्मरण भी।

कब्ज के लिए कभी–कभी एनिमा का उपयोग करो, उपवास के साथ। तीन उपवास के बाद पत्तीदार केवल उबाला हुआ साग दिन में एक बार, सवेरे और शाम को २० तोला धारोष्ण दूध गाय का बिना शक्कर का, इस प्रकार पांच दिन के बाद धीरे–धीरे अन्नाहार लो।

बापू के आशीर्वाद

गांधीजी और राजस्थान, पृ॰ २९५-९६

३२०. एक पुर्जा

[२४ अगस्त, १९२३ से पूर्व][]

मेरी राय में हमारा पिता है न ही माता, पत्नी है न ही बच्चे। हम भारत के हैं हर वृद्ध व्यक्ति हमें सेवा के लिए पुकारता है। जैसा कि प्रोफेसर के पिता के पास सेवा करने के लिए अन्य लोग हैं इसलिए जहां तक सम्भव हो उन्हें शालीनता से अपने को हटा लेना चाहिए और यह मान लेना चाहिए कि देश सेवा में ही पिता की सेवा निहित है। यदि उनके पिता बिना परिचर्या के होते तो उनकी सेवा ही भारत की सेवा होती।

मो॰ क॰ गांधी

अंग्रेजी की फोटो नकल (जी॰ एन॰ १०२०५) से आनन्द बाजार पत्रिका, २४-८-१९२३ में प्रकाशित प्रतिकृति से भी

  1. यह पत्र गांधीजी ने यरवदा जेल से लिखा था, जहां उन्हें २१ मार्च, १९२२ से ११ जनवरी, १९२४ तक रखा गया था। बाबा लक्ष्मणदास १९२१–२२ के दौरान साबरमती आश्रम में थे।
  2. 'आनन्द बाजार पत्रिका' में प्रकाशन की तिथि से
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