३३३. पत्र: परमानन्द आनन्दजी कापड़िया को
चैत्र सुदी ५ [६ जून, १९२४][१]
आपका पत्र मिला। सन्देश[२] भेज दिया है। देवदास आदि को भेजने का अर्थ जनता के समय की चोरी करने जैसा है। राजपूत परिषद में लोगों को भेजना अनिवार्य है इसलिए भेज रहा हूं। आप सब मिलकर बिना आडम्बर किये जितना कर सकते हैं, कीजिए। आपने जो बुराइयां बताई हैं उन सबसे में परिचित हूं। उनकी कुंजी मेरे सन्देश में निहित है। अपने पहले पत्र में दूसरे भाग का उत्तर आप 'नवजीवन' में देखेंगे।
मोहनदास के वन्देमातरम्
भावनगर
मूल गुजराती (जी. एन. ११५८७) से
३३४. पत्र: मथुरादास त्रिकमजी को
ज्येष्ठ सुदी ७ [९ जून, १९२४][३]
भाई नगीनदास[४] अभी-अभी यहां आये हैं। उनका कहना है कि जब तक पुस्तक भली प्रकार से आद्योपान्त पढ़ी नहीं जाती तब तक उसके साथ न्याय नहीं हो सकता।[५] वे तो इतना जानना चाहते हैं कि: इस संग्रह में संकलित विषयों पर मेरे विचार ठीक तरह से व्यक्त हुए हैं या नहीं? मेरे विचार से यह कसौटी ठीक है। मेरे विचार चाहे किसी भी स्रोत से लिये गये हों मेरे अभिप्राय को जाननेवाले उनको इस प्रकार प्रस्तुत करें कि अर्थ का अनर्थ न हो जाये। इसलिए यह
- ↑ डाक की मोहर से
- ↑ देखिए "सन्देश: सौराष्ट्र राजपूत परिषद को", ११-६-१९२४।
- ↑ मथुरादास त्रिकमजी ने यही तारीख नोट कर रखी है।
- ↑ नगीनदास अमुलख राय
- ↑ यहां तात्पर्य 'गांधी शिक्षण' नामक १३ पुस्तकों की पुस्तक-माला से है; देखिए "पत्र: मथुरादास त्रिकमजी को", १३-८-१९२४ और "पत्र: नगीनदास अमुलख राय को", १३-८-१९२४।