३३८. पत्र: सुमेर सिंह को
साबरमती
२ अगस्त, १९२४
मुझे आपका पत्र मिला। मैं सरदार मंगलसिंह और ए. एस. ब्यूरो[२] के साथ बराबर सम्पर्क में हूं। मुझे जो कुछ भी महत्वपूर्ण लगता है, मैं उसे प्रकाशित करता हूं अथवा उस पर टिप्पणी करता हूं। आपकी नजर में कभी कुछ भी छूटा हुआ आये तो उसकी ओर मेरा ध्यान आकर्षित करने के लिए मैं आपका आभारी होऊंगा।[३]
हृदय से आपका
मो. क. गांधी
सिंध
अंग्रेजी की नकल से: मोहम्मद अली पेपर्स। सौजन्य: जामिया मिलिया इस्लामिया पुस्तकालय
३३९. पत्र: मथुरादास त्रिकमजी को
[१३ अगस्त, १९२४][४]
यदि हो सके तो मुझे फिर से स्याही से लिखने की आदत डालनी है।
तीन दिन से तुम्हें लिखने की सोच रहा हूं, लेकिन आज तुमने मुझे हरा दिया। तुम्हारा पत्र आ गया। तुमने अच्छा चन्दा जमा किया है। राजा[५] को काफी मदद मिलेगी। इसकी जरूरत भी थी।
मैंने तो देवजी को तार भेजा है कि शेरिफ की सभा में जाने की आवश्यकता नहीं है। हमें तो जो कमेटी है उसकी सहायता करनी है।