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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 91.pdf/३२९

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पत्रः घनश्याम दास बिड़ला को

 

प्रथम बात तो यह है कि मनुष्य का धर्म है कि साधना के पश्चात जो अपन को सत्य लगे उसी चीझ को कहना भले जगत् को वह भूल सा प्रतीत हो—इसके सिवा मनुष्य निर्भय नहिं बन सकता है। अपना मोक्ष के सिवा और किसी चीझ का मैं पक्षपाती नहिं बन सकता हूं। परंतु यदि मोक्ष भी सत्य और अहिंसा का प्रतीकुल हो तो मुझे मोक्ष भी त्याज्य है। उक्त तीनों बातों में मैंने सत्य का हि सेवन कीया है। आपने जो कुछ मुझे जुहु में कहा था उसे स्मरण में रखते हुए मैंने जो कुछ भी कहा है वह कहा। जब मेरे नजदीक कुछ भी प्रमाण न हो तो मेरा धर्म है कि मैं स्वराज दल को आरोप से मुक्त समझें। यदि आप मुझको प्रमाण दे देंगे तो मैं उसका निरीक्षण करुंगा और आप उसका उपयोग करने देंगे तो मैं जाहेर में भी कह दूंगा। वरन मेरे दील में समझ कर मैं खामोश रहूंगा।

सोहरावर्धीजी को मैंने प्रमाण पत्र उनकी हुशियारी का दीया है। मैं अब भी उनकी हुशियारी का अनुभव कर रहा हुं।

सरोजिनी देवी के लीये आप खामखा घभराते हैं। मेरा दृढ़ विश्वास है कि उन्होंने भारतवर्ष की अच्छी सेवा की है और कर रही हैं। उनके सभापतित्व के लीये मैंने कुछ प्रयत्न इस समय नहिं कीया है। परंतु मेरा विश्वास है कि वह उस पद के लीये योग्य है यदि दूसरे जो आज तक हो गये वे योग्य थे तो उसके उत्साह पर सब कोई मुग्ध है। उसकी वीरता का मैं साक्षी हुं। मैंने उनका चारित्र दोष नहिं देखा है।

इन सब बातों का आप यह अर्थ न करें कि उनके या किसी के सब कार्यों को मैं पसंद करता हूं।

जड चेतन गुण दोषवत् विश्व कीन्ह करतार।
संतहंस गुण गहहिं पय परिहरी वारि विकार॥

आपका
मोहनदास गांधी

बापू की प्रेम प्रसादी, पृ. १०-११

 
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