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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 91.pdf/३३९

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३५९. पत्र: मथुरादास त्रिकमजी को

पौष वदी २ [१२ जनवरी, १९२५][]

चि. मथुरादास,

काठियावाड़ के प्रवास के दौरान मुझे तुम्हारी और आनन्द की याद आती रही। मैंने तुम्हारी उपस्थिति की और आनन्द के सुख-स्वास्थ्य की कामना की। आश्रम पहुंचकर तुम्हारे पत्र की बाट जोहूंगा। आनन्द से कहना कि मैं उसे रोज याद करता हूं। सनातनधर्मियों का विद्रोह करना ठीक हुआ। इससे वातावरण साफ हो जायेगा। यहां तो बहुत साफ हुआ है। मण्डप में अन्त्यज निडर होकर जा सके।[]

बापू के आशीर्वाद

मूल गुजराती से: प्यारेलाल पेपर्स। नेहरू-स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय; सौजन्य: बेलादेवी नैयर और डॉ. सुशीला नैयर

३६०. पत्र: मथुरादास त्रिकमजी को

सरभोण
पौष वदी ९ [१८ जनवरी १९२५][]

चि. मथुरादास,

तुम्हारा पत्र मिला। मैं ब्रह्मचर्य-पालन के सम्बन्ध में किसी पर दबाव तो नहीं डालता, पर उसके प्रति उदासीन रहता हूं। यह बात मेरे गले नहीं उतरती कि अपने युवा बच्चों को जमाना-बसाना माता-पिता का ही कर्त्तव्य है। बल्कि में तो ऐसा मानता हूं कि माता-पिता को उनके जमने-बसने में सहायता करनी चाहिए। संयुक्त प्रान्त का मामला तो बिलकुल अलग था। हमारे संकुचित समाज में यह प्रश्न नाजुक हो गया है। मैं तो सतर्क रहता हूं। आनन्द का स्वास्थ्य ठीक हो गया होगा। मैं २० और २१ को साबरमती में रहूंगा। २२ को सवेरे दिल्ली के लिए रवाना होऊंगा। तुम्हारे द्वारा कालिदास परमानन्द को जो तार भेजा था वह तो तुमने पहुंचा दिया होगा।

बापू के आशीर्वाद

मूल गुजराती से: प्यारेलाल पेपर्स। नेहरू-स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय; सौजन्य: बेलादेवी नैयर और डॉ. सुशीला नैयर

  1. 'बापुनी प्रसादी' से
  2. भावनगर में ८ और ९ जनवरी को गांधीजी की अध्यक्षता में आयोजित काठियावाड़ राजनीतिक परिषद् में
  3. डाक की मोहर पर से
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