३८६. पत्र : जेठालाल सम्पत को
साबरमती
चैत्र वदी १० [१८ अप्रैल, १९२५][१]
आपने अपना निश्चय लक्ष्मीदास को बता दिया होगा। यदि वे सहमत हों तभी रामेसरा छोड़ें। कुछ ही दिनों में मैं तो बंगाल की ओर जा रहा हूं, इसलिए मुझसे तो क्या ही मिल सकोगे।
आश्रम में कितने दिन रह सकूंगा, यह भी अनिश्चित है।
मोहनदास के वन्देमातरम्
मूल गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ९८४०) से। सौजन्य : नारायण जेठालाल सम्पत
३८७. पत्र : मथुरादास त्रिकमजी को
रविवार [१९ अप्रैल, १९२५][२]
तुम्हारा पत्र मिला। सी॰ पी॰ से सम्बन्धित कागज वापस भेज रहा हूं।
शिक्षा संस्था का [मामला] ठीक है। उसको सुलझा लेना।
आनन्द जब तक चाहें सेवा ले।
मेरा स्वास्थ्य ठीक है। ज्वर फिर से नहीं हुआ।
बापू के आशीर्वाद
मूल गुजराती से : प्यारेलाल पेपर्स। नेहरू—स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय: सौजन्य : बेलादेवी नैयर और डॉ॰ सुशीला नैयर