४०२. पत्र : शंकरलाल बैंकर को
रविवार [३१ मई, १९२५][१]
कल पत्र में एक बात लिखना भूल गया था। अनाथ आश्रम के लिए दस हजार रुपयों के ऋण की व्यवस्था करना जरूरी है। वे लोग ९ प्रतिशत ब्याज दे रहे हैं। यदि वे गारण्टी दें अर्थात अपनी जमीन गिरवी रखें तो क्या बोर्ड को उतने रुपयों का ऋण देने में कोई आपत्ति होगी? वे हमारी सभी शर्तें मानने के लिए तैयार हैं। जमीन तथा मकान की कीमत १०,००० रुपयों से अधिक ही है। इसका सोचकर तुरन्त उत्तर देना। यदि आप तार द्वारा सूचित करना ठीक समझें तो मुझे तार कर दें। बुधवार से शुक्रवार तक मैं दार्जिलिंग में रहूंगा।
बापू के आशीर्वाद
मूल गुजराती (एस॰ एन॰ ३२६९१) से
४०३. पत्र : रामदास गांधी को
दार्जिलिंग, बंगाल
५ जून, १९२५
तुम्हारे पत्र मुझे नियमित रूप से मिलते हैं।
यह पत्र में दार्जिलिंग के पहाड़ों के सामने बैठकर लिख रहा हूं। यहां का दृश्य देखने के लिए तुम मेरे साथ नहीं हो यह बात मुझे चुभती है, परन्तु तुम वहां का दृश्य देख रहे हो और उससे तुम्हें शान्ति मिल रही है, यह सोचकर मुझे सन्तोष है। मृत्यु-शयया पर पड़े हुए व्यक्ति को हिमालय के दृश्य से क्या सरोकार? भूखे को तो रोटी का दर्शन ही सन्तोष देगा। इसका अर्थ यही है कि व्यक्ति का मन जिससे प्रसन्न हो उसके लिए वही सच्चा व सही दृश्य है। यहां रहनेवाले हजारों गोरखाओं पर इस दृश्य का क्या प्रभाव होगा? वे तो उसे देखते भी नहीं। वहां तुम्हें पूर्ण स्थिरता और शान्ति मिले—यही मेरा आशीर्वाद और अभिलाषा है।
यह तो मैंने सामान्य रूप से लिखा था कि यदि हमारे और वरिष्ठ अधिकारियों के बीच मतभेद हों तो हमें अधिकारियों की ही बात माननी चाहिए। ऐसा मैंने देवचन्द[२] भाई को ध्यान में रखकर लिखा था। वहां के काम का कार्य भार उनपर है। तुमने दुगुनी रुई मांगी है। यदि देवचन्द भाई सहमत न हों तो निराश न होना, प्रसन्नचित हो उनके निर्णय को स्वीकार कर लेना। इसी