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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 91.pdf/३६९

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पत्र : सरोजिनी नायडू को

श्लोक पढ़ो लेकिन नियमित रूप से अर्थ सहित पढ़ना।

तुम्हारा कुंडला का वृत्तान्त बहुत दिलचस्प है। यदि तुम भय छोड़ दो तो तुम अनुभव करोगे कि तुम में बहुत शक्ति है।

ऊपर की घटना के कारण तुम ऐसा ही समझना कि अभी तो मैं कलकत्ता में ही हूं। विशेष वहां से लिखूंगा। आज इतना ही।

बापू के आशीर्वाद

[पुनश्च:]

सुरेन्द्र का पत्र मिला। पढ़ने योग्य है इसलिए तुम्हें भेज रहा हूं। चाहो तो पढ़कर फाड़ देना।

मूल गुजराती से : रामदास पेपर्स। सौजन्य : नेहरू–स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय

४०८. पत्र : सरोजिनी नायडू को

मिदनापुर
६ जुलाई, १९२५

मेरी अति प्रिय मीराबाई,

मुझे तुम्हारा मीठी फटकार भरा पत्र मिला। ईश्वर करे तुम्हारा प्रयास सफल हो। क्या तुम्हारा ख्याल है कि मैं जान–बूझकर रुका हुआ हूं? जब मुझे अन्त:करण का आह्वान मिलेगा तब मुझे आगे बढ़ने से कोई भी नहीं रोक सकेगा, यहां तक कि तुम भी नहीं। क्या मुझे तुम्हारे विशाल नेत्रों से टपके अश्रुमोती याद नहीं है जब तुमने मुझे तुरन्त पंजाब जाने की बात कही थी? तब मैं नहीं जा सका था। लेकिन जब मुझे अन्तःप्रेरणा हुई तो मैं एक क्षण भी नहीं रुक सका। निःसन्देह उन गरम आंसुओं का प्रभाव मेरे अवचेतन मन पर कहीं–न–कहीं अवश्य पड़ा था। अतः हर प्रकार से प्रयास जारी रखो और अपने अहिंसक प्रहार करती रहो। मैं तुम्हें कभी गलत नहीं समझंगा अथवा तुमसे नाराज नहीं होऊंगा। मैं चाहता हूं कि तुम मेरे अनुसार काम करो। मेरा विश्वास करो मैं भी तुम्हारे जितना ही आगे बढ़ने को अधीर हूं। मेरा ख्याल है हम प्रगति कर रहे हैं हालांकि इसके विपरीत प्रतीत होता है। सिर्फ मुझे १९२१ जैसी तात्कालिक आशा नहीं है वह एक नवजात उत्पन्न सुखद आकांक्षा थी। आशा आज भी है, लेकिन वह परिपक्व अनुभव और निश्चित अनुमानों पर आधारित है। खैर, मैं भारतीय आकाश में होनेवाली हर गतिविधि को ध्यान से देख रहा हूं। मुख्यतः मैं प्रार्थना कर रहा हूं। हां, उसमें आत्मग्लानि भी शामिल है, हमें नम्र बनने और आत्म–शुद्धि करने की आवश्यकता है।

तुम्हारा देशबन्धु के बारे में अन्दाजा बिलकुल ठीक है। मैं दार्जिलिंग में व्यतीत किये उन अनमोल क्षणों के लिए ईश्वर का आभारी हूं। क्रूर नियति ने प्याला मेरे ओठों तक लाकर मेरे सामने ही, मानो मेरा परिहास करने के लिए, टुकड़े–टुकड़े कर दिया हो।

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