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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 91.pdf/३८१

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४२८. पुर्जा : मीराबहिन को—मौन–दिवस पर

[९ नवम्बर, १९२५ या उसके पश्चात्][]

ईश्वर महान है वह तुम्हारी सहायता और रक्षा करेगा। हम जो भी भूल करते हैं यदि उसे सुधारना जानते हैं तो वह नगण्य हैं। और परमात्मा का शुक्र है, तुमने वह कर लिया है ताकि फिर से कभी वैसा न करो। फिर भी तुम संकटों का सामना करने के लिए आई हो, लेकिन वे सब हिम्मत बढ़ाने वाले हैं। ईश्वर करे वे तुम्हें सशक्त और सेवा के योग्य बनायें।

मूल अंग्रेजी (सी॰ डब्ल्यू॰ ५४४८) से। सौजन्य : मीराबहिन। जी॰ एन॰ ९४५० से भी

४२९. पत्र : रोमां रोलां को

साबरमती
१३ नवम्बर, १९२५

प्रिय मित्र,

मुझे आपका अति कृपापूर्ण पत्र मिला।[] उसके तुरन्त बाद कुमारी स्लेड पहुंच गई। आपने मुझे क्या निधि भेजी है। मैं इस महान धरोहर के योग्य बनने की कोशिश करूंगा। वह पूर्व और पश्चिम को मिलानेवाला सेतु बने, इस मामले में मैं उसे पूर्ण सहायता देने में कोई कसर नहीं छोडूंगा। स्वयं अपूर्ण होने के कारण मैं किसी को शिष्य नहीं बना सकता। वह मेरे साथ सह–अन्वेशक की तरह रहेगी। उम्र में और इसलिए शायद आत्मिक अनुभव में बड़ा होने के कारण उसके पिता कहलाने के गौरव में आपके साथ भागीदार होना चाहता हूं। कुमारी स्लेड प्रशंसनीय अनुकूलनशीलता दिखा रही है और उसने हमें अपने बारे में निश्चिन्त कर दिया है।

मैं बाकी बातें कुमारी स्लेड द्वारा बताये जाने के लिए छोड़ता हूं। मैं उनसे आपको एक फ्रांसीसी बहिन के विषय में सब कुछ लिखने को कह रहा हूं जो उनके आने से कुछ ही दिन पहले आश्रम में आई थीं।

हृदय से आपका
मो॰ क॰ गांधी

[अंग्रेजी से]

रोमां रोलां एण्ड गांधीजी: कॉरेस्पॉण्डेन्स, पृ॰ ५०-५१

  1. मीराबहिन ७ नवम्बर, १९२५ को अहमदाबाद पहुंची थीं। इस तारीख के बाद मौन–दिवस अर्थात् सोमवार ९ नवम्बर को था।
  2. रोमां रोलां ने गांधीजी को लिखे अपने १ अक्तूबर, १९२५ के पत्र में मीराबहिन के बारे में लिखा था "...मुझे भरोसा है कि आप उसे अपने अत्यन्त कट्टर और निष्ठावान शिष्यों में से एक पायेंगे। उसकी आत्मा उत्कृष्ट शक्ति और उत्कट श्रद्धा से परिपूर्ण हैं। वह स्पष्ट और ईमानदार है। आपके उद्देश्य के लिए इससे अधिक निःस्वार्थ और श्रेष्ठ आत्मा यूरोप में नहीं है। ईश्वर करे वह अपने साथ हजारों यूरोपवासियों का प्यार और मेरी श्रद्धा वहन करे।"
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