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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 91.pdf/३९३

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४५१. पत्र : मथुरादास त्रिकमजी को

रविवार [२० दिसम्बर, १९२५][]

चि॰ मथुरादास,

तुम्हारा पत्र मिला। गिरधारी के अभी वहां रहने से जमनालालजी को कोई मुश्किल नहीं होगी। इस समय मैं तुम्हारे पास गिरधारी से अच्छा व्यक्ति नहीं भेज सकता, मगर साबरमती जाकर जरूर भेजूंगा। इसलिए गिरधारी बिना संकोच भले वहां रहे।

तुम्हारी तबीयत वहां अच्छी हो ही जायेगी। कितना आराम लेना है इसका हिसाब हम अभी से क्यों लगायें? जब तक तुम ठीक नहीं हो जाते तब तक तो आराम करना ही है। हम पहले आवश्यक उपाय करें, फिर तो अधीर होने का कोई कारण ही नहीं है।

यदि पत्र लिखने में बिलकुल परिश्रम न होता हो तो फिर लिखने में कोई हानि नहीं है। मैं समझता हूं कि पसलियों और फेफड़ों की तकलीफ में लेटे रहने से जल्दी आराम मिलता है। अभी चलना शुरू नहीं करना।

कुछ भी चाहिए तो मंगवा लेना।

तारामती को दूसरा पत्र लिखूंगा।[]

अभी विशेष ट्रेन रद्द हो गई है, इसलिए अब सरोजिनी बाई आ ही नहीं सकतीं। तुमसे स्टेशन पर आने की आशा तो वह नहीं कर सकतीं। यदि करती भी हैं तो निरर्थक है। तुम तो फिलहाल बंगला छोड़ ही नहीं सकते।

मुझे डॉ॰ दलाल को लिखने में संकोच होता है। तुम्हारी तबीयत अब सुधर ही रही है। इसलिए अब नहीं लिखूंगा। यदि जरूरी लगे तो फिर मुझे तार दे देना। यह पत्र तुम्हें सवेरे मिलेगा। यदि तबीयत दिखलानी जरूरी लगे तो मुझे यहां तार देना। यहां से मुझे मंगलवार दोपहर को जाना है और उसके बाद कानपुर।

कल मुझे पत्र नहीं मिला। समाचार तो मुझे हमेशा मिलने ही चाहिए। मंगलवार को यहां पत्र पहुंचते ही हैं। सोमवार को बारह बजे से पहले भेजे हुए पत्र तो मुझे मिलते ही हैं।

बापू के आशीर्वाद

मूल गुजराती से : प्यारेलाल पेपर्स। नेहरू-स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालयः सौजन्य : बेलादेवी नैयर और डॉ॰ सुशीला नैयर

  1. तिथि का निर्धारण पत्र में शुक्रवार २२ दिसम्बर, १९२५ को गांधीजी के कानपुर प्रस्थान करने के उल्लेख से किया गया है। इससे पहले रविवार २० दिसम्बर को था।
  2. देखिए अगला शीर्षक।
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