५४९. पत्र : हरिभाऊ उपाध्याय को
साबरमती
आश्विन शुक्ल ४, १९८२ [१० अक्तूबर, १९२६]
आपका पत्र मीला। मार्तंड[१] का स्वास्थ्य अच्छा हो रहा है जानकर मुझे आनंद होता है। यहां क्यों अच्छा नहिं होता था उसका सबब मिल सके तो मुझे बतलाना। उपचार में क्या कीया जाता है? व्रतों के पालने के बारे में आप भाईयों का परिश्रम सफल हों। चर्खा द्वादशी के दिन काम अच्छा हुआ।
खोराक के प्रयोग का परिणाम मुझे बतलाते रहना।
बापु के आशीर्वाद
मूल पत्र से: हरिभाऊ उपाध्याय पेपर्स सौजन्य: नेहरू-स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय
५५०. एक वार्ता
[१० अक्तूबर १९२६ के पश्चात्][३]
जैसी प्रतीति एक कैदी को अपने वकील का भाषण सुनकर हो आई सुनते हैं, वैसी ही भाई नरहरि की रिपोर्ट पढ़कर मुझे बारडोली के किसानों की ओर से हो आई। अपने वकील की दलीलें सुनने के पश्चात् कैदी की आंखों से अश्रुधारा बहती देखकर जब न्यायाधीश ने उससे पूछा: 'ऐसे क्यों रो रहे हो' तो कैदी ने जवाब दिया, साहब! सच पूछा जाये तो मुझे तो पता ही नहीं था कि मैं इस कदर निर्दोष हूं। नरहरि की रिपोर्ट पढ़नेवाले किसान भी कहीं यह तो नहीं कह रहे होंगे कि 'अरे, यदि हम इतने ही गरीब हैं तो अब तक जिन्दा कैसे रहे'।
लेकिन इतने से ही हमें सन्तोष नहीं मान लेना चाहिए। तुम जैसा कहते हो ऐसे भी लोग नहीं जी सकते। यदि तुम्हारी बात सच हो तब गांवों की संख्या में कमी होनी चाहिए। और वह कमी सिद्ध की जानी चाहिए। हर अमुक वस्तु का कुछ आवश्यक परिणाम भी होता ही है। बारडोली में कितने लोग बाहर से कमाये पैसे पर निर्वाह करते हैं, कितने बाहर चले गये हैं और