५५५. पत्र : एमिल रॉनिगर को[१]
[२९ अक्तूबर, १९२६ से पूर्व]
मैंने जानबूझकर इतने सप्ताह बीत जाने दिये और आपके पत्र का उत्तर नहीं दिया। इसलिए नहीं कि मेरे मन में रोमां रोलां के लोकोपकारी कार्य की प्रशंसा में अपना योगदान देने की इच्छा नहीं थी जिन्हें विश्व-पर के अनेक व्यक्तियों द्वारा श्रद्धांजलि दी जायेगी।
मेरी कठिनाई यह थी कि आपने जिन साहित्यकारों से लेख आमन्त्रित किये हैं, मुझे उनकी पंक्ति में बैठते हुए संकोच अनुभव हो रहा था। यह दिखावटी विनय नहीं, बल्कि मेरी अन्तर्भूत भावना है। में स्वीकार करता हूं कि मैं इसके लिए इस कारण भी अयोग्य हूं, क्योंकि मुझे उक्त महान और सज्जन मित्र के विषय में इससे पहले लगभग कुछ भी मालूम नहीं था जिन्होंने स्वेच्छापूर्वक मेरा प्रचारक बनने का भार अपने ऊपर लिया था।[२] कदाचित आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि अब भी उनके विषय में मेरा ज्ञान यहीं तक सीमित हैं कि मैंने अपने विषय में लिखी उस पुस्तिका[३] को एक सरसरी निगाह से देखा है। मुझे इतना अधिक काम रहता है कि मैं जिन चीजों को पढ़ना चाहता हूं उन्हें पढ़ने के लिए मेरे पास समय ही नहीं बचता। अतः मैं अभी तक उन सज्जन की किसी महान कृति को नहीं पढ़ सका हूं। इसलिए रोमां रोलां के बारे में जो-कुछ भी जानता हूं, वह उनके निजी सम्पर्क में आनेवाले व्यक्तियों से प्राप्त जानकारी तक ही सीमित है। शायद यह बेहतर ही है कि मैं उन्हें पारस्परिक मित्रों के सजीव अनुभवों के माध्यम से जानूं। उन्हीं लोगों के कारण मैं जीवन के हर क्षेत्र में उनके सभी कार्यों में निहित गहन मानवीय भावना को समझ सका और उसका मूल्यांकन कर सका। उनके जीवन और कृत्यों से संसार और ज्यादा समृद्ध हुआ है। ईश्वर करे वे मानवजाति के बीच शान्ति प्रसार का महान कार्य करने के लिए दीर्घायु हों।
मो॰ क॰ गांधी
रोमां रोलां एण्ड गांधी कॉरेस्पॉण्डेन्स, पृ॰ ७७-७८
- ↑ प्रस्तुत पत्र के अंश "पत्र: सम्पादक को", २९-१०-१९२६ में पहले दिये जा चुके हैं।
- ↑ रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने गांधीजी को इस आशय की खबर भेजी थी कि "आप अपनी ही इच्छा से मेरे प्रचारक बन गये हैं, "गांधी का यह कथन रोमां रोलां को अच्छा नहीं लगा। इस बारे में गांधीजी के स्पष्टीकरण के लिए देखिए "पत्र : रोमां रोलां को", २९-१०-१९२६।
- ↑ 'महात्मा गांधी'