५७२. पत्र : नाभा के महाराजा को
आश्रम
साबरमती
१ जनवरी १९२७
मुझे यह जान कर दुःख हुआ कि आपके सम्बन्ध में कांग्रेस[२] के सम्मुख एक प्रस्ताव रखा गया। मुझे यह भी ज्ञात हुआ कि आपकी इच्छा और अनुरोध से ही यह प्रस्ताव पेश किया गया था।[३] जब मुझे पहली बार इसके विषय में बताया गया, तभी मैंने सरदार शार्दूल सिंह से कहा था कि इस प्रस्ताव पर आग्रह करना हानिकर होगा। मैंने उनसे कहा कि जिस समय मैं पूना में बीमार था मैंने आपसे सम्बन्धित कागजात पढ़े थे और मैं इस बात से सन्तुष्ट था कि आपका मामला ऐसा नहीं है जिसपर जन-आन्दोलन किया जाये और यदि किसी सहायता की अपेक्षा की जा सकती हैं तो वह केवल उचित राजनयिक माध्यम से ही प्राप्त हो सकती है जिसमें जन-आन्दोलन के लिए वास्तव में कोई स्थान नहीं है। मैंने सरदार शार्दूलसिंह को यह भी कहा कि कांग्रेस का इस आन्दोलन के साथ सम्बन्ध रखना अनुचित होगा और ऐसा करना आपके अपने उद्देश्य की दृष्टि से भी हानिकर होगा। फिर भी पण्डित मोतीलाल जी और मेरी अनुपस्थिति में यह प्रस्ताव विषय समिति के सामने रखा गया। मेरे विचारानुसार समिति ने इसे बिना सोचे-विचारे जल्दबाजी में स्वीकार कर लिया। अगले दिन सुबह इस घटना के बारे में मुझे सूचित किया गया। मेरे साथ-साथ पण्डित मोतीलालजी को भी यह जानकर दुःख हुआ कि यह प्रस्ताव पारित हो गया। मुझे केवल तभी मालूम हुआ कि पण्डित मोतीलाल जी आपके कानूनी सलाहकार थे। मुझे स्वयं वकील के रूप में कुछ अनुभव है और मेरा विचार है कि जब कोई मुद्दई अपने कानूनी सलाहकार के पीठ पीछे उस न्याय को प्राप्त करने के अन्य तरीके अपनाता है जिसकी जिम्मेदारी उसने चुने हुए वकील को सौंपी है तो ऐसी स्थिति में वह अपने उद्देश्य को जबरदस्त हानि पहुंचाता है। मुझे यह भी मालूम हुआ है कि आप पुनः बहाल होने के लिए इतने अधीर थे कि आपने उसके लिए कई तरह के उन लोगों को खूब पैसा दिया जिन्होंने भी आपको बहाली की आशा दिलाई। मैं भारत का मित्र और सेवक हूं इसलिए आपका भी मित्र और सेवक हूं। अतः मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यदि आप लोगों को इसी प्रकार पैसा देते रहे हैं जैसाकि मुझे बताया गया है, तो आप अपने उद्देश्य और प्रतिष्ठा को हानि पहुंचा रहे हैं। मेरी राय हैं कि आपको अपने सभी मित्रों को कांग्रेस के सम्मुख आपका मामला पेश करके जन-आन्दोलन करने से रोकना चाहिए