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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 91.pdf/४७६

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५९५. पत्र : मथुरादास त्रिकमजी को

गुरुवार [४ मई, १९२७][]

चि. मथुरादास,

बहुत दिनों से तुम्हें लिखने का इरादा था जिस पर आज अमल कर पा रहा हूं। एक दिन भी ऐसा नहीं बीता होगा जिन दिन मैंने तुम्हारा नाम न लिया हो और तुम्हें याद न किया हो।

नन्दी के बारे में पता लगाने के लिए तुमने प्यारेलाल से कहा था। मेरी राय में नन्दी तुम्हें अनुकूल नहीं रहेगा। यहां पूरे बारह महीने नहीं रह सकते। यहां के मौसम में २४ घंटों में बहुत परिवर्तन आते हैं। और सर्दी और गर्मी के मौसम में तो बहुत बड़ा फर्कहोता है। सुविधा की सब चीजें नीचे से लानी पड़ती हैं। जून महीने में सीज़न खत्म हो जाता है इसलिए तुम्हारे लिए पंचगनी ही उपयुक्त समझता हूं।

पंचगनी के बंगले का हम कब तक उपयोग करेंगे, यह अलग सवाल है। यह सीज़न तो चला ही गया हैं। इसलिए अब बरसात में वहीं रहना ठीक है। बाद में महाबलेश्वर जाना तुम्हारे लिए शायद ज्यादा ठीक रहेगा। अक्तूबर से वहां का मौसम अच्छा माना जाता है। अगले साल भी अगर तपश्चर्या करनी ही पड़ी तो क्या करना है, यह सोचने के लिए काफी समय है ही।

रेवाशंकर भाई सोलन में रहते हैं। उनसे सोलन के बारे में पूछा है ।

मेरी तबीयत तो अब अच्छी होने लगी है इसलिए इसके बारे में कुछ लिखना जरूरी नहीं है।

देखता हूं कि तारामती को जब तक उत्तेजित न किया जाये तब तक वह लिखेगी ही नहीं। उससे कहना कि इसे में आलस्य समझता हूं। उम्मीद तो यह है कि पंचगनी में रहकर अपने शरीर, मन और आत्मा को पूरा-पूरा लाभ पहुंचायेगी।

ऐसा लगता है कि दिलीप उर्फ रोहित पूरा लाभ उठा रहा है।

अभी तुम्हारा तार मिला है। इसलिए प्यारेलाल को रुक जाने के लिए बंगलौर तार किया है।

तुम्हारे पत्र से तो ऐसा लगता है कि प्यारेलाल को रोकने में केवल मेरा ही हाथ था। मैं कुछ दिनों के लिए उसे रोकना चाहता था। कल तुम्हारा तार आया तो उसने जाने की अनुमति मांगी और मैंने दे दी।

अब तुम्हारे पत्र की प्रतीक्षा करूंगा। और जो उचित होगा करूंगा।

मेरे बारे में तुम्हारी यह इच्छा थी कि मैं पंचगनी में रहूं। लेकिन ऐसा करना सम्भव नहीं था। काम के कारण मेरा इसी प्रान्त में रहना जरूरी था। स्वास्थ्य अच्छा हो जाने पर यहां का काम तो समाप्त करूंगा ही; यह सही है कि वह कुछ नये तरीके से होगा।

कुछ पढ़ रहे हो क्या ?

बापू के आशीर्वाद

मूल गुजराती से प्यारेलाल पेपर्स । नेहरू-स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय; सौजन्य: बेलादेवी नैयर और डॉ. सुशीला नैयर

  1. 'बापुनी प्रसादी' से
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