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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 91.pdf/४७७

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५९६. पत्र : मथुरादास त्रिकमजी को

रविवार [८ मई, १९२७][]

चि. मथुरादास,

आज प्यारेलाल तुम्हारे पास आ रहा है। यह पत्र तो तुम्हें उसके आने के एक दिन बाद मिलेगा। मैं यह पत्र उसके साथ न भेज सका। प्यारेलाल ने सोचा कि वहां के हिसाब आदि के लिए तो उसे वापस जाना ही चाहिए इसलिए उसे भेजा है। तुमने उसके बिना चला लेने का इरादा किया है वह ठीक ही है, बशर्ते कि तुम्हारे स्वास्थ्य को इससे हानि न पहुंचती हो। स्वास्थ्य में इतना सुधार हुआ है, उसे तो ईश्वर का उपकार ही समझना चाहिए। लेकिन जब भी मदद की जरूरत हो तो मुझे लिखने में संकोच न करना। इस बार तो बरसात के दिन वहीं बिता देना मुझे तो अच्छा लगता है। देवलाली की अपेक्षा पंचगनी तो अच्छा है ही। बरसात में तो वह खास तौर से अच्छा माना जाता है। तबीयत बिलकुल ठीक हो जाने पर सर्दियों में बम्बई के पास ही रहें तो ठीक होगा। लेकिन इसमें ज्यादा तो डॉक्टर समझ सकते हैं।

मेरा पहले का पत्र मिला होगा।

बापू के आशीर्वाद

मूल गुजराती से: प्यारेलाल पेपर्स। नेहरू-स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय; सौजन्य: बेलादेवी नैयर और डॉ. सुशीला नैयर

५९७. पत्रः अनसूयाबहिन साराभाई को

[१० मई, १९२७ के पूर्व][]

चि. अनसूयाबहिन,

तुम्हारा पत्र मिला। मेरी चिन्ता छोड़ो मेरा स्वास्थ्य तो अच्छा हो रहा है। जब तक मेरा नन्दी दुर्ग में रहना डॉक्टर सही समझेंगे तब तक रहूंगा, इसके बाद बंगलौर क्योंकि नन्दी में जून महीने में काफी सर्दी हो जाती है और बंगलौर में कम होती है। अब यात्राएं तो नहीं करनी हैं, लेकिन सर्दी शुरू हो जाने के बाद और स्वास्थ्य में पूरा सुधार आ जाने के बाद मद्रास-कर्नाटक में दो-तीन स्थानों पर आराम से रहकर वहां पैसे तो इकट्ठे करने ही हैं। छोटी परन्तु आरामदेह यात्रा, जिसमें भाषण न देने पड़े, करने में कोई दोष नहीं दिखाई नहीं पड़ता है कई डॉक्टरों से बात करने पर भी किसी ने वैसे बन्धनों की सलाह नहीं दी है जैसे कि तुम बताती हो। और जब बोलना ही नहीं है, सोचना नहीं, कुछ करना नहीं है तो फिर किस काम के लिए तुम मुझे जीवित रखना चाहोगी? मैं अभी इतनी शक्ति तो पैदा नहीं कर सका हूं कि चुपचाप बिस्तर में लेटे-लेटे मात्र

  1. 'बापुनी प्रसादी' से
  2. पत्र के अन्तिम अनुच्छेद से जिसमें गांधीजी ने सकलातवाला के पते की पूछताछ की है, और १० मई, १९२७ को शापुरजी सकलातवाला को लिखे पत्र से, लगता है कि यह पत्र १९२७ में १० मई से पूर्व लिखा गया होगा।
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