विचारों से ही सेवा कर सकूं। इसलिए स्वास्थ्य के मामले में दुनिया में आम तौर पर जितनी सावधानी बरती जाती है मुझसे उससे ज्यादा की उम्मीद रखना मेरा दुरुपयोग करने जैसा होगा। 'यंग इंडिया' और 'नवजीवन' के लिए मैं जितना लिख रहा हूं उतना लिखने की डॉ. मेहता ने मनाही नहीं की है। सब यही कहते हैं कि जिस फुर्ती से मैं आज तक काम करता था उतनी फुर्ती से मुझे अब काम नहीं करना चाहिए। उतनी फुर्ती से तो मैं कर भी नहीं सकता. लेकिन आराम के साथ शक्ति के अनुसार तो हो सकता है। यही नहीं, डॉ. मेहता को लगता है कि उतना काम अगर मैं नहीं करूंगा तो बिलकुल बीमार हो जाऊंगा।
इसीलिए मैं चाहता हूं कि तुम सब लोग मेरी बहुत ज्यादा चिन्ता न करो।
सकलातवाला के बारे में मैं पण्डितजी को लिख रहा हूं। उनका विलायत का पता क्या है ?
बापू के आशीर्वाद
मूल गुजराती (एस. एन. ३२७९५) से
५९८. पत्र : ए. रंगास्वामी आयंगार को
नन्दी हिल
१० मई, १९२७
मैं कार्यकारी समिति के निर्देशानुसार धारा ७वीं (४) बी[१] से सम्बन्धित नियमों का मसौदा भेज रहा हूं।
हृदय से आपका
मो. क. गांधी
श्रीयुत ए. रंगास्वामी आयंगार
महासचिव, अ. भा. कां. क.
देशबन्धु भवन
माउंट रोड, मद्रास
[संलग्न]
नियमों का मसौदा
- संविधान की धारा ७ के अन्तर्गत सूत के रूप में चन्दा देनेवाला हर व्यक्ति स्वयं काता
- ↑ कांग्रेस संविधान की धारा। देखिए "भाषण: कांग्रेस अधिवेशन, गौहाटी में" २७-१२-१९२६ और "खादी सदस्यता", ९-६-१९२७।
सम्भवतः यह १५ और १६ मई, १९२७ को बम्बई में होनेवाली अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक के लिए भेजा गया था; देखिए "पत्र : श्रीनिवास आयंगार को", ११-५-१९२७ और पा. टि. १