६०४. पत्र : अनसूयाबहिन साराभाई को
शुक्रवार २० मई, १९२७
तुम्हारा पत्र मिला। मेरे पत्र और सकलातवाला को लिखे हुए पत्रों की नकलें तुम्हें मिल गई होंगी।
अन्त्यज कन्याशाला खोलने की बात तो मुझे अच्छी लगेगी ही। और यह भी मैं अच्छी तरह समझता हूं कि तुम उसी वजह से रुक गई हो।
मेरी तबीयत अच्छी हो रही है। अब मैं कुछ ज्यादा घूमता हूं। आहार में थोड़ी रोटी और मक्खन शामिल कर लिये हैं और एक फल कम करके कुछ हरी सब्जी भी शामिल कर ली है। अब देखें इसका क्या परिणाम निकलता है।
जमनालालजी, राजेन्द्र बाबू आदि आज आये हैं।
तुम अपनी तबीयत का ख्याल रखो।
बापू के आशीर्वाद
मूल गुजराती (एस. एन. ३२८२३) से
६०५. पत्र : मगनलाल गांधी को
नन्दी दुर्ग
२१ मई, १९२७
तुम्हारा पत्र मिला। जमनालाल को और छगनलाल को लिखे तुम्हारे पत्र मैंने पढ़े। रामचन्द्र और गणेश के बारे में समझा। तुम सबको जो ठीक लगे वह करो।
एक बात लिखने की मेरे मन में आ रही है। रामचन्द्र और गणेश दोनों अच्छे और ईमानदार व्यक्ति हैं। ऐसे आदमियों को निभाया जा सकता है तो निभाना चाहिए। लेकिन ऐसे लोगों को निभाने में एक चीज बराबर करनी चाहिए, और वह यह कि हमें मृदुता के साथ उतनी ही कड़ाई भी बरतनी चाहिए। कड़ाई से अभिप्राय यह है कि उनके दोष बताने में हमें बिल्कुल भी संकोच नहीं करना चाहिए। रामचन्द्र से साफ-साफ कह देना चाहिए आप अतिश्योक्ति करते हैं। आप उतावले हैं, क्रोधी हैं और अपने दोष देखने को तैयार नहीं हैं। अगर आप यहां रहना चाहते हैं तो उन दोषों को देखने के बाद और उन्हें कम करके ही रह सकते हैं। आपका गांधी को अपील करना निरर्थक होगा क्योंकि उन्होंने सारी सत्ता हमें सौंप रखी है। इतना स्पष्ट बता देने के बाद भी अगर वह रहता है तो उसे निभा लें और अगर जाता है, तो चाहे कितनी भी असुविधा हो, उसे जाने दें। गणेश से भी साफ कह देना चाहिए हमें शक है कि आपको जो हुनर आता है वह आप औरों को बताना नहीं चाहते हैं। आप बताकर औरों को तैयार करें तभी हमारा निभ सकता है।