वरना आप आजाद हैं। लेकिन अपने से बढ़कर आप किसी को तैयार करें और फिर भी आप रहना चाहें तो आपको निकाल देने का हमारा इरादा नहीं है। आपको आज जो सहायता मिलती है वह मिलती रहेगी। हम चाहते हैं कि आप रहें, लेकिन आप हमारी शर्त पर ही रह सकते हैं। मतलब यह कि जिस व्यक्ति के बारे में हमारे मन में जो भी हो वह उसे साफ-साफ बता देना ही कड़ाई है। यह सब बताने में हमें मृदुता बरतनी है। और हमें कोई भी निर्णय एकाएक ही नहीं करना है। मृदुता से अभिप्राय यह भी है कि दोष में भी, हो सके तो अच्छा ही देखने का प्रयत्न हो। लेकिन आखिर तो जिस दोष के विषय में हमें पक्का विश्वास है यदि उस दोष को पूरा-पूरा बताया जाये तभी हमारा व्यवहार शुद्ध रहेगा, हमारा काम आगे बढ़ेगा, और हम सत्याग्रही कहे जायेंगे। मैं यह देखता हूं कि मनुष्यों के बीच व्यवहार सरल नहीं है। फिलहाल तो एक-दूसरे में दोष साफ दिखाई देने पर भी उन्हें बताने में संकोच होता है। यह संकोच का पर्दा यदि हट जाये तो बहुत-सा काम सरल हो सकता है। यह तो केवल तुम्हारे मार्गदर्शन के लिए हैं।
रामचन्द्र का पत्र शायद तुम्हारे लिए उपयोगी सिद्ध हो, यह सोचकर उसे इसके साथ वापस भेज रहा हूं।
बापू के आशीर्वाद
मूल गुजराती से : छगनलाल गांधी पेपर्स । सौजन्य : साबरमती संग्रहालय, अहमदाबाद
६०६. पत्र : रानी विद्यावती को
नन्दी दुर्ग
वैशाख कृष्ण १४ [२९ मई, १९२७][१]
आपका पत्र मिला है। मुझको बड़ा आनंद हुआ। पैसे की पहुंच आश्रम से भेजी गई है। चर्खे के बारे में जो मुश्कैलियां थी उनका खुलासा भी वहां से भेज दिया गया है। फिर भी यदि चर्खा न चले तो आश्रम में दुबारा लिखना और मुझे भी लिखना।
गोरक्षा के लिये पैसा इकट्ठा किया वह पुण्यशाली काम है। मैं उम्मीद करता हूं कि हमेशा इस काम पर सब भगिनि ध्यान देती रहेंगी।
आपका
मोहनदास गांधी
मूल पत्र से : रानी विद्यावती पेपर्स। सौजन्य : राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय और पुस्तकालय
- ↑ वर्ष का निर्धारण गांधीजी के नन्दीदुर्ग में ठहरने के अनुसार किया गया है।