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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 91.pdf/४८५

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६०७. पत्र : गंगादेवी को

नन्दी दुर्ग
वैशाख वदी १४ [२९ मई, १९२७]

प्रिय भगिनि गंगादेवी,

खत मिला है। अब तक इतनी दुर्बलता रही है यह चिंताजनक लगता है। यदि भूख लगे तो दूध का वजन बढ़ाना चाहिये। हमारे यहां तो दूध अच्छा हि रहता है। इसलिये यदि कच्चा लिया जाय तो भी ठीक होगा। मैं तो उस दूध के साथ दस नीम के पत्ते का रस भी लेता हूं। नीम के पत्ते का रस डालने से दूध का स्वाद बिगड़ता नहिं हैं। एक दो दिन इतना करके देख लेना।

बापू के आशीर्वाद

मूल पत्र से: बनारसीदास चतुर्वेदी पेपर्स। सौजन्य : भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार


६०८. पत्र : अनसूयाबहिन साराभाई को

कुमार पार्क, बंगलौर सिटी
[५ जून, १९२७ के पश्चात्][]

चि. अनसूयाबहिन,

तुम्हारा पत्र मिला।

अगर मिल-मालिक एति.सी. वाले पैसे का उपयोग नहीं करने दें तो हमारे लिए यह लोभ छोड़ देना जरूरी है। मैं नहीं मानता कि मंगलदास पर मेरे लिखने का कोई असर होगा। इससे अच्छा तो यह है कि उनके साथ और मिल के दूसरे लोगों के साथ तुम साफ-बात कर लो और उनके मन की बात जान लो। तुम अगर चाहो तो गोरधनभाई को लिख दूं। मजदूरों के लिए भी काम हमें उदासीन भाव से ही करना है। वे अगर अपना हित किसी भी तरीके से नहीं समझेंगे तो फिर हम क्या करेंगे? अन्त्यज शालाओं के लिए तो पैसे अन्त्यजों के काम से मिलेंगे। औरों के लिए भी जरूरत हो तो मांगकर पैसे इकट्ठे किये जा सकते हैं, लेकिन हम यह नहीं चाहते कि मजदूर दीन और भिखारी बन जायें। उनके पास पैसे की सुविधा है। वे पैसे निकालें और अपने बच्चों को पढ़ाने आदि में उसका उपयोग करें। मैं जानता हूं कि यह काम कठिन है। उनके लिए पैसे मांगकर इकट्ठा करना आसान है। लेकिन हम तो काम को कठिन समझकर ही उसमें लगे हैं। उसमें अपना सर्वस्व लगाने पर भी यदि हम हार जायें तो वह हार नहीं है, जीत है। क्योंकि हारने में भी हमारा और हमारे उद्देश्य का हित होना चाहिए। इसलिए पूरी मेहनत करने के बाद भी अगर कुछ शाखाएं बन्द कर देनी पड़ें तो भले ही वे बन्द हो जायें।

  1. पत्र के पाठ के अनुसार गांधीजी बंगलौर रविवार ५ जून को पहुंचे थे।
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