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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 91.pdf/४९४

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्‌मय

अनुरूप खादी-कार्य में प्रगति हो रही है और आपका स्वास्थ्य ठीक चल रहा है और आपको अधिकारी वर्ग की ओर से कोई परेशानी नहीं हो रही है। ऐसा लगता है कि फिलहाल मेरा स्वास्थ्य ठीक है और अब मैंने गम्भीरतापूर्वक दक्षिण में चार माह का प्रवास शुरू कर दिया है। मैसूर में जो कुछ भी किया गया था, उसे मैं नगण्य मानता हूं।

हृदय से आपका
मो. क. गांधी

श्रीयुत मोतीलाल राय
प्रवर्तक संघ
चन्द्रनगर

अंग्रेजी की फोटो नकल (जी. एन. ११०३३) से

६२२. पत्र: नारायण मोरेश्वर खरे को

सोमवार-मंगलवार [५/६ सितम्बर, १९२७][]

भाई पण्डितजी,

तुम्हारा पत्र मिला है।

पूज्य गंगाबहिन ने खबर दी है कि एक दिन नींद आ जाने के कारण तुम प्रार्थना करने से चूक गये तो उस दिन तुमने उपवास किया और यह व्रत भी लिया कि आगे फिर कभी ऐसा हुआ तो तुम उसी वक्त उपवास करोगे। यदि ऐसा है तो तुमने ठीक किया है। परन्तु सुबह उठने के आग्रह के साथ जल्दी सोने का भी आग्रह रखना चाहिए। बच्चों की खातिर भी हम बड़ों को इस प्रकार का आग्रह रखने की आवश्यकता है।

प्रार्थना अब ठीक से हो रही है, यह जानकर मुझे आनन्द हुआ है। मुझे उम्मीद है कि जिन लोगों ने नियमपूर्वक प्रार्थना में आने का निश्चय किया है, वे कभी बिना कारण गैरहाजिर नहीं होंगे। इस प्रकार निश्चय पर अडिग रहकर ही उससे अत्यन्त सुन्दर परिणाम निकलेगा, यह मैं मानता हूं।

जैसी शान्ति सुबह की प्रार्थना के समय होती है वैसी ही शाम की प्रार्थना के समय भी बनाये रखना जरूरी है। उसका एक उपाय तो यह है कि जब तक प्रार्थना पूरी न हो जाये, कोई भी बातचीत न करें। मैंने स्वयं इस नियम का पालन नहीं किया। अब से मैं तो करूंगा। कोई पहले से आकर बैठने को बाध्य नहीं है। समय हो जाने पर प्रार्थना में एक क्षण की भी देर नहीं होनी चाहिए। तब किसी को रोकने की आवश्यकता ही नहीं होगी। जैसे ही लोग आये वे आसनबद्ध होकर आंख बन्दकर बैठ जायें। बच्चों को भी इन नियमों का पालन करना सिखाना चाहिए प्रार्थना पूरी होने से पहले कोई दातुन न बेचे। और मुझे तो लगता है कि प्रार्थना के दौरान तकली चलाने पर भी प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए। तकली को प्रोत्साहन देने में भी दोष मेरा ही हैं मगर यह

  1. पत्र के पाठ से ज्ञात होता है कि यह पत्र १४ सितम्बर, १९२७ को नारायण मो. खरे को लिखे पत्र से पहले लिखा गया था।
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