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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 91.pdf/४९९

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पत्र: मथुरादास त्रिकमजी को

उस पर कार्यवाही करूंगा। आपने भारतीय परिवेश के बाहर अपने निवास (आस्ट्रिया) से ऐसी कल्पना करने की जो भूल की मुझे उस पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ। वैसे भी जब आपका पत्र प्राप्त हुआ, उस समय मैं बंगलौर में स्वास्थ्य लाभ ले रहा था। यहां मैं आये दिन प्रवास पर रहता हूं और मैं नहीं जानता कि आपको किस प्रकार सन्तोष प्रदान करूं। मैंने आपके पत्र से यह अनुमान लगाया कि यदि मैंने कुछ उत्तर दिया होता तो भी अब काफी विलम्ब हो चुका था। यदि आप समझते हैं कि आपको अभी भी मुझसे कुछ अपेक्षा है तो मैं आपको पाण्डुलिपि भेज दूंगा, इसे पढ़ने का प्रयत्न करें और कुछ लिख डालें। मेरी व्यक्तिगत राय यह है कि आपको मुझसे किसी भी चीज की जरूरत नहीं है। मेरी पाश्चात्य देशों में जितनी प्रतिष्ठा है, वास्तव में मैं उसके योग्य नहीं हूं और मैं अक्सर सोचता हूं कि यदि मैं यूरोप अथवा अमरीका गया तो मेरे बारे में वहां के लोगों में जो अतिशयोक्ति पूर्ण धारणाएं हैं, वे सब भ्रम बहुत जल्द दूर हो जायेंगे। आप मेरा इस बात का विश्वास करें कि मैं ऐसा दिखावटी आत्म-अवज्ञा के कारण नहीं लिख रहा हूं, बल्कि वास्तव में मेरा यही विश्वास है।

मो. क. गांधी

[अंग्रेजी से]

गोल्डन बुक ऑफ दिलीपकुमार राय, पृ. १२१

६२८. पत्र : मथुरादास त्रिकमजी को

रविवार [२५ सितम्बर, १९२७][]

चि. मथुरादास,

तुम्हारा पत्र मिला। यदि पंचगनी ही तुम्हें ज्यादा ठीक लग रहा है तो वहां बंगला अवश्य ढूंढ़ लो। मुझे इस बात का दुःख है कि हम पट्टणी साहब का बंगला नहीं मांग सकते। मुझे इस बारे में कोई शक नहीं है लेकिन हमारा धर्म ही यही हैं कि हम उसे न मांगें।

मणिलाल के भाई के बारे में तुम्हारा तार मिला था। मेरी तबीयत अच्छी है।

बापू के आशीर्वाद

मूल गुजराती से: प्यारेलाल पेपर्स। नेहरू-स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय; सौजन्य: बेलादेवी नैयर और डॉ. सुशीला नैयर

  1. डाक की मोहर पर से
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