६२९. पत्र : गंगाबहिन झवेरी को
आश्विन वदी १ [११ अक्तूबर, १९२७][१]
तुम्हारा पत्र मिल गया है।
पुस्तकों के बारे में लिखना तो मैं भूल ही गया था। मणिलाल नभुभाई द्वारा 'षड्दर्शन समुच्चय' का अनुवाद अगर समझ सको तो पढ़ लेना। यह सिफारिश मैं इसकी भाषा की दृष्टि से नहीं कर रहा हूं, बल्कि जटिल विचारों को समझने के लिए ही कहता हूं। तुम्हें मनसुखराम का अस्तोदय' भी पढ़ना चाहिए। नवलराम के चुने हुए लेख तथा आनन्द शंकर भाई के लेख भी पढ़ लेने चाहिए। महादेव द्वारा किया हुआ मोरेली की प्रसिद्ध पुस्तक का अनुवाद भी। इसके अलावा और बहुत-सी पुस्तकों का सुझाव दे सकता हूं। लेकिन इतना ही अच्छी तरह समझने में तुम्हें कुछ महीने तो लग ही जायेंगे। 'षड्दर्शन समुच्चय' ग्रन्थ का कुछ हिस्सा समझ लेना चाहिए। वह भी अगर कठिन लगे तो तुम्हारे लिए कोई बड़ा व्याकरण पढ़ लेना भी जरूरी है। और भी अच्छे सुझाव तुम्हें भाई नरहरि भी दे सकते हैं; क्योंकि उन्होंने गुजराती का विशेष अभ्यास किया है और अब भी कर रहे हैं।
मेरी मान्यता है कि तुम्हें किसी खास शिक्षक की जरूरत नहीं है। तुम अपने-आप पढ़ सको इतना ज्ञान तो तुम्हारे पास है ही। जो अर्थ स्वयं न समझ सको उसे वहां जो कोई भी उपलब्ध हो उससे पूछ सकती हो—रमणिकलाल हैं, वालजीभाई हैं।
बहिनों के झगड़ों के बारे में तुम जो लिखती हो वह सही है। लेकिन इस समय जो मेल दिखाई देता है वह तो शिष्टता के नाते है। इस विषय में बहिनों के नाम अपने पत्र[२] में मैंने इस सम्बन्ध में खुलासा कर दिया है; इसलिए यहां ज्यादा नहीं लिखूंगा।
मीराबहिन से मिलती रहो। एक तो उसे स्नेह देने को और दूसरे उससे स्नेह पाने को। उसकी उम्र की उसके जैसी और कोई कुमारिका यहां नहीं है।
बापू के आशीर्वाद
गुजराती की फोटो नकल (जी. एन. ३१२३) से