६४३. पत्र: रामदास गांधी को
[२२][१] दिसम्बर, १९२७
तुम्हारा पत्र मिला है। तुम तो व्यर्थ ही घबरा गये हो। मुझे तो आशा है कि मेरी तबीयत ठीक हो जायेगी। लेकिन अगर ठीक नहीं होती है और मैं बिस्तर पकड़ लेता हूं तो...
यह चार दिन पहले शुरू किया था। इतने में डॉक्टर[२] आ गये और फिर लिखना रह गया। अब बाकी आज मद्रास पहुंचकर लिख रहा हूं। ...हम देख लेंगे। इस समय तो हम यह संकल्प कर ही लें कि बसंत पंचमी के दिन[३] तुम्हें ईश्वर का नाम लेकर और उसकी सहायता मांगकर नये जीवन में प्रवेश करना है और नई जिम्मेवारी को वहन करना है।
मेरी तबीयत में देखने को तो कोई तकलीफ नहीं है, लेकिन ब्लडप्रेशर बहुत ज्यादा है, इसमें शायद शक नहीं है। मुझे आराम की ही जरूरत है। यह कहना भी सही नहीं है कि स्वास्थ्य के बारे में जो नियम मैं दूसरों को बताता हूं उसका मैं खुद पालन नहीं करता हूं। लेकिन यह बात अगर तुम किसी दिन पूछोगे तो समझा दूंगा।
इस वक्त तो मैं तुम्हारे पिछले पत्र में एक बात थी उसके बारे में लिखना चाहता हूं। नीमु अलग काम क्यों न करे? तुम जानते हो कि हमारे देश के लाखों गरीब ऐसा करते हैं। और फिर हम तो भंगी और ढेड़ बने हुए हैं? रामजीभाई और गंगाबहिन का क्या? असंख्य किसानों के घरों में दोनों साथ-साथ कमाते हैं। मिलों में मर्द-औरत दोनों काम करते हैं। यहां अन्ना और उसकी पत्नी गोमतीबहिन दोनों तनख्वाह लेते हैं। दूसरे लोग हिन्दी का काम कर रहे हैं। ऐसा करने में तुम्हारी गृहस्थी कष्टप्रद नहीं बनेगी बल्कि सुचारू रूप से चलेगी और तुम एक आदर्श दम्पत्ति बनोगे। हजारों दम्पत्ति काम करते-करते प्रजोत्पत्ति भी करते हैं। हां, इतना जरूर है कि वे ऐश आराम से नहीं रह सकते। लेकिन इस सम्बन्ध में मुझसे और खुलासा करने की जरूरत हो तो कर लेना। मैं कामना करता हूं कि तुम्हारा जीवन सुखमय, सादा, उपयोगी और रसमय बने। और ऐसे अवसर मौजूद भी हैं। सब कुछ तुम्हारी और नीम की शिक्षा पर निर्भर है। मैं उसे शिक्षा देकर योग्य बनाना चाहता था मगर न बना सका। मेरे मार्ग में अड़चनें आ गईं। मैं बीमार भी हो गया और आश्रम में आकर तीन अड़चनों का एक साथ सामना करने में असमर्थ रहा। परन्तु नीमु खुद अच्छी लड़की है इसलिए मुझे चिन्ता नहीं है। तुम्हारा शरीर इसमें कहां तक काम देगा यही मुख्य सवाल है।
अब ज्यादा नहीं लिखूंगा। इमाम साहब बीमार होकर आये हैं इसलिए उनसे मिलने जा रहा हूं। १ जनवरी या उससे पहले मुझे आश्रम पहुंचने की उम्मीद है।
बापू के आशीर्वाद
[गुजराती से]
मोटानां मन, पृ. ३९-४०