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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 91.pdf/५१४

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६५२. पत्र : मथुरादास त्रिकमजी को

शुक्रवार [३ फरवरी, १९२८][]

चि. मथुरादास,

तुम्हारा पत्र बहुत दिनों के बाद मिला है। तुमने पट्टणीजी का बंगला छोड़ दिया, यह बहुत अच्छा हुआ। नये में सुविधाएं तो हैं, ऐसा शंकरन् लिखता था। यह तुमने अच्छा किया कि लिखित या मौखिक कोई वचन नहीं दिया है।

रामदास का विवाह बसंत पंचमी के दिन हो गया। वर-वधू अभी यहीं हैं। देवदास भी यहीं है।

मेरा स्वास्थ्य अच्छा रहता है। फिलहाल तो मैं अपने असली आहार का प्रयोग कर रहा हूं। मुझे यह अच्छा लगता है। सूखे और ताजे मेवे लेता हूं। ऐसा करते लगभग एक महीना हो गया। मार्च के अन्त तक तो यहीं हूं।

तारामती ने एक पत्र लिखकर मौन धारण कर लिया है।

अब घूमते समय कितना फासला तय कर सकते हो ?

बापू के आशीर्वाद

मूल गुजराती से: प्यारेलाल पेपर्स। नेहरू-स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय; सौजन्य: बेलादेवी नैयर और डॉ. सुशीला नैयर

६५३. पत्र: कान्तिप्रसाद चन्द्रशंकर अन्ताणी को

माघ वदी २, ७ फरवरी, १९२८

भाई श्री कान्तिप्रसाद,

कच्छ की समस्याओं के बारे में इतना ही कह सकता हूं कि उन समस्याओं का सही तरीके से हल तो कच्छ की प्रजा ही कर सकती है।

मोहनदास के वन्देमातरम्

[गुजराती से]

पुरुषार्थी कान्तिप्रसाद चन्द्रशंकर अन्ताणी, पृ. ८०

  1. मथुरादास को यह पत्र ५ फरवरी १९२८ को मिला था। इससे पहले शुक्रवार ३ फरवरी को था।
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