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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 91.pdf/५३७

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६९५. पत्र: मथुरादास त्रिकमजी को

आश्रम, साबरमती
२ सितम्बर १९२८

चि. मथुरादास,

तुम्हारा पत्र मिला। पंचगनी में महामारी का फैलना मनुष्य होने के नाते हमारे लिए शर्म की बात है। एक अच्छे हवा और पानी वाले स्थान को अपने रहन-सहन से हमने गन्दा करके रख दिया है। और उसे महामारी से मुक्त करने की शक्ति और साहस हममें नहीं रह गया है। तुम खाली बैठे हो इसलिए इसका कारण सोच सकते हो। माथेरान आदि स्थानों में रहकर देखने का तुम्हारा विचार मुझे अच्छा लगता है। शंकरन् अब बिलकुल अच्छा हो गया होगा। लगता है कि वह गूंगा हो गया है।

बापू के आशीर्वाद

मूल गुजराती से: प्यारेलाल पेपर्स। नेहरू-स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय; सौजन्य: बेलादेवी नैयर और डॉ. सुशीला नैयर

६९६. पत्र: विजया को

आश्रम, साबरमती
५ सितम्बर, [१९२८][]

चि. विजया,

इस बार बहुत दिनों के बाद पत्र मिला। डॉ. प्रभुदास बिलकुल अच्छे हो जायें तो कितना अच्छा हो? आप सब लोगों का वहां जाना और मथुरादास और शंकरन् का वहां आना, यह कैसा संयोग हो गया? रामदास बारडोली में रहता है। देवदास दिल्ली में है। नवीन[] और रसिक[] भी दिल्ली गये हैं।

बापू के आशीर्वाद

अ. सौ. विजयाबहिन
लीलावती सेनेटोरियम
ब्लॉक नं. २
देवलाली

मूल गुजराती से: छगनलाल गांधी पेपर्स। सौजन्य: साबरमती संग्रहालय, अहमदाबाद

  1. वर्ष का निर्धारण पत्र के पाठ के आधार पर किया गया है। साधन-सूत्र में '१९२५' लिखा हुआ है जो स्पष्टतया भूल है।
  2. नवीन गांधी
  3. हरिलाल गांधी का पुत्र
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