६९७. एक पत्र
आश्रम, साबरमती
९ सितम्बर, १९२८
बच्चों के बारे में ठीक ही लिखा है। हमने जो कहा होगा और उन्होंने जो पढ़ा होगा उसे तो वे भूल जायेंगे, लेकिन हम जो करते हैं उसे वे अपनी इच्छा या अनिच्छा से याद रखेंगे और स्वयं भी वही करेंगे। आश्रम में तो विशेष रूप से, क्योंकि जो हम करते हैं वही सच्चा है, इस बात पर हम हमेशा जोर देते हैं।
स्त्री के लिए तो उसका घर और उसका चूल्हा ही सब कुछ है। अपने चूल्हे के मार्फत तो वह शासन करती है। जैसे करोड़पति करोड़ों रुपयों को संभाल कर रखने और उन्हें बढ़ाने के लिए सारा दिन मेहनत करता है, वहीं बात स्त्री पर भी लागू होती है। इसीलिए जब उसे रसोईघर की मार्फत मिल रही सूक्ष्म सत्ता का मोह चला जायेगा तब वह संयुक्त रसोईघर से और उसमें मिलनेवाले कैसे भी आहार से सन्तुष्ट रहेगी। लेकिन मैंने तो अब दूसरों से आग्रह करना भी छोड़ दिया है।
गुजराती की नकल से: कुसुमबहिन देसाई की डायरी। एस. एन. ३२५७७/१ से
६९८. पत्र: पद्मजा नायडू को
साबरमती
११ सितम्बर, १९२८
तुम्हारी मां ने अपने महान उद्देश्य के लिए जहाज से रवाना होने से पूर्व कुछ घंटे मेरे साथ बिताये इससे मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। जैसा कि स्वाभाविक था हमने तुम्हारे बारे में काफी बातचीत की। देखता हूं अब तुम्हें चलने-फिरने की अनुमति है। यदि डॉक्टर अनुमति दें तो तुम्हारे लिए यह अच्छा होगा कि तुम श्रीमती अम्बालाल के साथ कुछ दिन बिताने का उनका निमन्त्रण स्वीकार कर लो। अहमदाबाद की जलवायु शुष्क है। यदि तुम आईं और तुममें काम करने लायक ताकत रही तो तुम्हें व्यस्त रखने के लिए यहां काफी काम है। मुझे यह बात बिलकुल अच्छी नहीं लगी कि तुम 'हिन्दू' के स्थायी कर्मचारी के रूप में कार्य करो। तुम काम नहीं करोगी। तुमने यह बहुत अच्छी और बहादुरी की बात की है कि मां को अमरीका जाने दिया।[१] और उन्हें भेजने के बाद
- ↑ सरोजिनी नायडू १२ सितम्बर, १९२८ को अमरीका रवाना हुई थी। इस विषय में विवरण के लिए देखिए "टिप्पणियां" १३-९-१९२८ और "टिप्पणियां", १६-९-१९२८।