आप चाहें तो मुझसे इतना कबूल करवा सकते हैं कि 'अहिंसा' का शायद मैंने नया अर्थ किया होगा। आपकी ही दी हुई व्याख्या के अनुसार अहिंसा को परमधर्म कहना मुझे अतिशयोक्ति जैसा लगता है। लेकिन शब्द का झगड़ा तो मैंने कभी उठाया ही नहीं है इसलिए 'अहिंसा' शब्द का प्रयोग न करने से अगर कोई हेतु सिद्ध हो जाये तो मैं उसका प्रयोग बन्द कर दूंगा।
मेरे किये कार्यों से लोग गलत निष्कर्ष निकालेंगे यह भय तो [बछड़े के] प्राण लेते समय भी था ही। लेकिन मुझे लगा कि अहिंसा शब्द के सही अर्थ के बारे में सोच-विचार इतना कम हो गया है कि वह भय मोल लेकर भी मुझे यह काम करना चाहिए। कुछ करने के बाद प्रसंग आने पर भी मैं उसे छिपाने लगूं, यह तो हो ही कैसे सकता है?
बेटी के बारे में इतना ही कहूंगा कि जहां तक बेटी के प्राण लेने का सवाल है मैं यह समझकर उसके प्राणहरण नहीं करूंगा कि वह स्वयं दोषी है, बल्कि अगर वह बोलने की स्थिति में होती तो वह प्राणहरण का दान अवश्य मांगती, यह समझकर मैं उसके प्राण लूंगा। मैं यह बिलकुल ही स्वीकार नहीं करता हूं कि किसी भी हालत में मनुष्य अपने प्राणत्याग करने को तैयार नहीं होता। उसमें मुझे पामरता की गंध आ रही है और वह अनेक मनुष्यों के अनुभव के विरुद्ध है। अगर मनुष्य को जिन्दा रहने का इतना मोह है तो फिर मनुष्य प्रगति नहीं कर सकता। मोक्ष तो वह प्राप्त ही कैसे करेगा? असंख्य उदाहरण ऐसे हैं जिनमें मैंने देखा है कि हिन्दुस्तान के बाहर ऐसा मोह बहुत कम होता है।
बन्दरों से जो असुविधा हो रही है इसमें भी मैं देखता हूं कि अहिंसा शब्द के अर्थ के झगड़े में ही पड़ना होगा।[१] इसलिए इस विषय की चर्चा छोड़ दूं? जब हम कभी मिलेंगे तब इस प्रश्न पर विचार करें तो कैसा रहेगा? आपने जो तीन सिद्धान्त रखे हैं उनके बारे में मुझे बहुत कुछ कहना है। अगर मुझे फुर्सत मिली तो मैं आपके पत्र में उठाई गई बातों पर 'नवजीवन' में चर्चा करूंगा।
मोहनदास के वन्देमातरम्
गुजराती की फोटो नकल (जी. एन. ११५९५) से
७१०. पत्र : वि. ल. फड़के को
सोमवार [१५ अक्तूबर, १९२८][२]
दलसुखभाई के बारे में खबर सुनकर मुझे बहुत दुःख हुआ है। उनके परिवार के सदस्यों को मेरी ओर से धीरज बंधायें। दलसुखभाई का ममताभरा चेहरा मुझे अच्छी तरह याद है। उनकी कमी तो पूरी हो ही नहीं सकतीं। लेकिन हम सबको बोझ उठाना ही है। कुटुम्बीजनों से कहिए