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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 91.pdf/५५

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दैनन्दिनी, १८९४

कुछ भी पैसा नहीं लेंगे। मुहम्मद ईसाकजी का पत्र मिला, साथ में अनुवाद के लिए एक पुस्तक भी थी। उसे पत्र लिखा कि वह पौंड १-१-० शुल्क के रूप में भेज दें। नारण को काम के लिए रख लिया है। और जीवा को ३ पौंड प्रति माह के हिसाब से।

१६ सितम्बर, रविवार

एस्क्यू से उनके घर पर मिला। श्रीमती ए॰ को मेरा शाकाहार या बौद्धधर्म पर बोलना अच्छा नहीं लगा। उन्हें डर हुआ कि उनके बच्चों पर उसका दूषित प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने मेरी सच्चाई पर सन्देह प्रकट किया। उन्होंने कहा कि यदि मैं ईमानदार नहीं हूँ और सत्य की खोज में नहीं हूँ तो मुझे उनके घर नहीं जाना चाहिए। मैंने उनसे कहा कि उन्हें यह विश्वास दिलाना कि मैं सच्चा हूँ, मेरी शक्ति के बाहर है और उन पर अपना साहचर्य थोपने की मेरी कोई इच्छा नहीं है। मैंने उनसे कहा कि मैं उनके बच्चों का हृदय-परिवर्तन करने वाले के रूप में उनके घर नहीं गया। शाम को रुस्तमजी के साथ भोजन किया। मेहता ने अपने अद्भुत स्वप्न की सारी बात सुनाई। अब्दुल्ला को पत्र लिखा।

१७ सितम्बर, सोमवार

भाईजी, मेहता, दादाभाई और छगनलाल के एक-एक पत्र मिले।

भाईजी और मेहता को पत्र लिखे। अब्दुल्ला को भी पत्र लिखा।

१८ सितम्बर, मंगलवार

कांग्रेस कमेटी की बड़ी कोलाहलपूर्ण सभा हुई। वार्ड. . .बोलने आये, मगर उन्हें बोलने नहीं दिया गया, इसलिए अखबारों में लिखने की धमकी देकर चले गये।

१९ सितम्बर, बुधवार

आज गोपी महाराज का मुकदमा चला। हर्जाने के सहित, फैसला हो गया। बेकर को 'एडवर्टाइजर' की कतरन भेजी, जिसमें मैकनील की सेवाओं का विवरण था। अब्दुल रहमान को. . .पत्र लिखा।

मूल अंग्रेजी (एस॰ एन॰ ३२३२०) से

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