७३९. एक पत्र[१]
वर्धा
२० दिसम्बर, १९२८
जब तुमने समर्पण करने का निश्चय कर लिया है, तो मैं तुम्हें कैसे निकाल सकता हूं? मुझे तुम्हें सजा नहीं देनी है। किसी को सजा देना मनुष्य के हाथ में नहीं है... मुझे तो तुम्हारा मार्गदर्शन करना है। तुमसे अक्षम्य भूलें हो जायें तो सजा भोगनी है। इस समय तो दुःख भोगने जैसी सजा दी है। अब आगे दुःख मत देना।
गहनों के बारे में तो मुझे ... ने भी लिखा था। ऐसा लगता है कि तुम्हारे पहले के पत्र में और इस बार के पत्र में फर्क है। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
तुम्हें तो अब मैं देख लूंगा। तुम्हारे साथ जो आजतक मैंने नरमी बरती है अब वह नहीं बरतूंगा। ... रुपयों के अन्दर तुम्हारा खर्च रखूंगा। लेकिन तुम्हारे स्वास्थ्य के लिए जो खर्च करना पड़ेगा वह मैं करूंगा। ... इसका न्याय अब तुम नहीं करोगी। ... मुझे या और किसी को यह करना पड़ेगा। लेकिन तुम्हारा स्वास्थ्य तो खराब नहीं होना चाहिए। खाने के सिवा दूसरे खर्च से मुझे नफरत है। खाने के लिए ... से ज्यादा जो चाहे वह दूंगा। आजकल क्या-क्या खा रही हो यह बताना...। अगर तुमने मन को हल्का कर दिया है तो तुम अब बीमार पड़ोगी ही नहीं।
इससे ज्यादा स्पष्टीकरण की जरूरत हो तो मांग लेना ...। मुझे लिखा करना।
गुजराती की नकल से: कुसुमबहिन देसाई के डायरी। एस. एन. २३५७७/४२ से
७४०. एक पत्र[२]
वर्धा
२० दिसम्बर, १९२८
आप पर भारी धर्मसंकट है। सगाई करने में आपका हाथ है।... मुझे तो लगता है कि... को लिखना चाहिए कि वह १८ साल की हो जाये तब तक रुक जाये...। छ. का पत्र उसे भेज दें। यदि वह इतना रुकने को भी राजी न हो और छ: के पत्र के बावजूद भी अभी ही विवाह के लिए तैयार हो तो...की इच्छा क्या है यह उसे बताकर लाचार होकर आप उसकी शर्त पर उपहोटा में कन्यादान दे दें और अपने हाथ धो लें। यह सब...को भी बता दें कि आप उसकी और उसकी मां की इच्छा के अनुसार चले हैं। अगर वह सहमत हो जाये तो सगाई में आपका हाथ होने की वजह से प्रायश्चित के रूप में कन्यादान दे दें। उसकी मां के साथ भी व्यवहार ठीक कर लें। मुझे तो आपके लिए यही धर्म सूझता है। लेकिन आखिर तो आपको जो सूझे वही ठीक होगा।
गुजराती की नकल से: कुसुमबहिन देसाई की डायरी। एस. एन. ३२५७७/४१ से