सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
का व्यापार के लिए लाइसेन्स प्राप्त करने का दावा हुसैन अमद से भी आधा बनता है, मगर वे आज भी अपना व्यापार कर रहे हैं। वाकर्स्ट्रम के पक्षपातपूर्ण रवैया रखनेवाले कुछ यूरोपीयों के कहने पर हुसैन अमद को, जो दस वर्षों से दूकानदारी कर रहे हैं और जिनके पास लम्बी अवधि का पट्टा आज भी मौजूद है, आज अपनी दूकान मजबूरन बन्द करनी पड़ी है। हाल में जारी सरकारी सूचना उनके जैसी स्थिति के लोगों का बचाव करती है। मेरी समिति सादर निवेदन करती है कि वे निस्सन्देह स्पष्ट रूप से अन्याय से आक्रान्त हैं और महामान्य के हाथों न्याय पाने के अभिलाषी है।
आपका आज्ञाकारी सेवक
अब्दुल गनी
अध्यक्ष, ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन
- [अंग्रेजी से]
- प्रिटोरिया आर्काइव्ज : एल-जी॰ ९२९७/एल-जी
१५. पत्र : ट्रान्सवाल के लेफ्टिनेंट-गवर्नर के निजी सचिव को
ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन
बाक्स ६५२२
जोहानिसबर्ग
२७ अप्रैल, १९०३
निजी सचिव
महामान्य, लेफ्टिनेंट-गवर्नर
प्रिटोरिया
महोदय,
इसी माह की २४ तारीख को प्राप्त आपके २२ अप्रैल के पत्र की प्राप्ति की सूचना भेजने का सम्मान मुझे प्राप्त हुआ है।
महामान्य के उस उत्तर के लिए मेरी समिति सादर धन्यवाद देती है, जिससे यह जाहिर होता है कि महामान्य भारतीय समाज के साथ न्याय करना चाहते हैं, क्योंकि उन्होंने १९०३ के सरकारी नोटिस नं॰ ३५६ की उदार व्याख्या की है।
किन्तु इस उत्तर से भारतीय समाज को भारी दुःख भी पहुँचा है क्योंकि मेरी समिति की विनम्र राय में इस उत्तर से महामान्या भूतपूर्व साम्राज्ञी की सरकार द्वारा युद्ध के पूर्व की गई घोषणाओं को, और बाद में महामहिम की सरकार द्वारा दिये गये इन आश्वासनों का कि, मौजूदा कानून पर फिर विचार किया जायेगा, अतिक्रमण होता है। अतः मेरी समिति इस सामान्य प्रश्न पर बाद में पुनः विचार करने के लिए बाध्य होगी। फिलहाल तो [सरकारी] नोटिस और आपके पत्र
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