सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
भले ही मणिया[१]श्रको सौंपे। मैं भी लिखूँगा। इस तरह की बातों में मनुष्य को [कभी-कभी] बुद्धि के साथ काम करना पड़ता है, ऐसा थोड़ा होना चाहिए।
मणिलाल को आठ से नौ बजे का समय देना स्वभावतः द्वेष उत्पन्न करने जैसा है। प्रेस के समय में तुम्हारा मेरा प्राइवेट काम करना अनुचित जान पड़ता है। इसलिए आठ बजे से पहले का अथवा साँझ को जितना समय दिया जा सके उतना पर्याप्त है। उतने समय में उसके भाग्य में जितना होगा उतना सीखेगा।
पिआनो के लिए मैंने मणिया को वचन दिया है और यही बात आड़े आती है। यदि मणिया के मन का समाधान हो जाये तो बेशक, फिलहाल इस खर्च को टाल देना।
बैण्ड के लिए जो अपील की गई वह ठीक ही हुआ। इस अपील को मैं निःस्वार्थ मानता हूँ। बैण्ड आयेगा तो सब उसका लाभ उठायेंगे। इसकी मैं हम सबके लिए आवश्यकता समझता हूँ। इस मामले में श्री वेस्ट ने कोई भूल की है, ऐसा मैं नहीं मानता। [लेकिन] उसके लिए अथक प्रयास करने की जरूरत नहीं। इसमें एक दिन चला गया। [सो कोई बात नहीं।] अन्ततः हम समय की बचत कर सकेंगे, ऐसी मान्यता है। इस समय जो लोग हैं वे ठीक से तैयार नहीं हुए हैं, लेकिन जब तैयार हो जायेंगे तब सारा काम झटपट हो जायेगा।
हिन्दी के विषय में तुम्हारा पत्र जब दुबारा आयेगा तब मैं अपने विचार व्यक्त करूँगा। लेकिन इतना निश्चित है कि अगर पहले ही ग्राहक बन जाते हैं तभी इस उपक्रम में हाथ डाला जा सकता है।
अंग्रेजी संस्करण में बाजार भाव देने में कोई हर्ज नहीं। लेकिन अगर उन्हें गुजराती संस्करण में अथवा विज्ञापन के रूप में प्रकाशित किया जाये तो बेहतर होगा। फिलहाल तो अंग्रेजी संस्करण में केवल राजनीतिक विषय ही होते हैं इसलिए उसमें बाजार भाव देना उचित नहीं लगेगा।
एन्टी इंडियन ला फण्ड के बारे में विचार करके लिखूँगा।
इस्माईल मियाँ ने ब्लाक के बिना विज्ञापन रखने की स्वीकृति दे दी है, इसलिए उसे रखना। [बाद में] शायद थोड़ी जगह के जो दाम हैं, वह देंगे।
जो कतरनें रह गई हैं उनके बारे में बराबर सूचित करते रहना।
मैंने बैंक को लिखा है कि मैं लोगों को पेटेण्ट दवाएँ लेने की सलाह नहीं दे सकता,
- ↑ मणिलाल गांधी
५६