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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/१०

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भूमिका बहुत दिनों से मेरे अनेक मित्रों का यह आग्रह था और स्वयं मेरी भी यहाच्या योकि मैं गद्य में कोई अच्छा ग्रंथ लि; परंतु अनेक कार्यों की झंझटों के कारण मुझे रतना अवकाश ही नहीं मिलता था कि मैं नित्य प्रति के कामों से समय यथा- कर उसे किसी अंथ के लिखने में लगाता। मेरा आठ वर्ष का लखनऊ का प्रवास तो इन झंझटों को बढ़ाने दी का कारण हुआ । जिन्हें इस बात का अनुभव होगा. वे जानते होंगे कि एक हेड मास्टर को, और विशेष कर एक ऐसे हेडमास्टर को जिसके स्कूल के साथ छात्रावास भी लगा हो, सवेरे से लेकर संध्या तक का समय किस प्रकार मित्ताना पड़ता है और अंत में रात्रि को यह कितना शिचिल और अकर्मण्य सा हो जाता है। इसके अतिरिक्त वह स्वयं उस स्कूल के विद्यार्थियों और अध्यापकों कैलिये आदर्श हो जाता है और पाउशाला रूपी कुल का कुलपति माना जाता है। ऐसी स्थिति उसकी अपनी उन्नति कोचाधक ही हो सकती है, सदायक नहीं। इस अवस्था में रहकर यदि मैं न तो अपनी रच्या प्री कर सका और न अपने मित्रों के आग्रह का ही पालन कर सका, तो इसमें कोई आक्षर्य की बात नहीं है। सन् १९२१ मैं मेरे काशी लौट आने पर पूज्यपाद पंडित मदनमोहन जी मालधीय ने मुझे काशी विश्व विद्यालय में हिंदी