सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/१०१

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

20 साहित्यालोचन उम्ोजित हो जाती है। इस प्रकार वह उनसे हमारा संबंध स्थापित करती है। हमें इस बात का पता नहीं लगता कि यह भावना भ्रमात्मक है अथवा वास्तविक है। अथषा वह हमें वस्तुओ की धास्तविक प्रकृति या गुणों का शान करती है या नहीं। हमें तो इस बात से काम है कि कविता हममें इस माघमा को उत्तेजित करती है। और इसी में उसकी मचता है। विज्ञान पदार्थों की इस भावना को चैसा उसेजित नहीं करता, जैसा कि कविता करती है।" देखिग, इन्ही कला में से किसी किसी फूल को चुनकर कवि क्या कहते हैं- "शिला गया कृल उपयन मै । मुनी हो रहे हैं सब तम्बर, चेनसनी मन में । स्प अनता लेकर आया, म सुधि फैलाई। सब केहदब देश अपनी प्रभुता बजा उहाई ॥" "अहो कुसुम कमनीय, महा भयो फले नहीं समान हो ? कम विनिय हो रंग निवाने मंद मंद मुमचाते हो। हम भी ना कुछ सुनें, किस लिप दनना है उल्लास तुम्हें । बात बात में किस विलकर तुम किस की इस उदाते ६॥ कैसा हवा लगी या तुमने, क्षणिक विश्व में भूलो मत । सभी संधरा है. कल साँचो, अवसर या गात हो।" "प्रीम काल के अंत समय का यह करिकादधति प्यारी। विकसी हुई सी कोमा पाती इसकी छधि न्यारो॥