सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/१०२

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

<! कविता का विवेका कणियों और मिली थी जो सब, थी इसकी खासियों सारी। सो सम अम्हाला गई रेखिए, सूनी है उनकी क्यारी ।। 'मुष टुन दोनों आते जाते इस जग में बारी बारी । इन कलिकाओं से मुचित है विधि-विपाक या संसारी " भारतवालो मात्र ग्रोम के ताप को प्रखंडता और वर्षा के शान्तिमय सुखद प्रभाव का अनुभव करते हैं। वैज्ञानिक तो हमें इतना ही बतावेगा कि बाहर अमुक विन ताप इतनी डिग्री और अया में इतनी विग्री था; और गत वर्ष की अपेक्षा इतना कम या अधिक था । पर कधि कहेगा- "प्रलय प्रचंड संडकर को किरन देखो मैटर ठक नवखद धुमक्षति है। औटि के करादी रतवाकर कोलसों नैन कगि बल को सार उपसति है। श्रीपम को मठिन करारुपात जागीया काल भ्याल मुखर्की र पिपलति है। लमा भयो भासमान भूदर भभूला भयो भभकि भविभूमि दाना उगलति है।" "जीवन को श्रासकर माता को प्रकासकर भोर होते भासकर आसमान सायो है। धमक धमक धूप सूखत सलाप कूप पौन कौन जौन औन आगि में रसायो है।