सहायता से की पढ़ाई की व्यवस्था ठीक करने और उसे उन्नति तथा पत्ता जना देने के लिये आमंत्रित किया । अपने अनुकूल कार्य पाकर मुझे आनंद और संतोष हुआ। सन् १९२२ तक का समय तो सब व्यवस्था के ठीक करने में लग गया और गत जूलाई से पफ ए, बी०ए० और पम० ए० में हिंदी की पढ़ाई आरंभ करने का निश्चय हो गया। एम ए के पाठक्रम में तीन विषय पेसे रखे गत जिनके लिये उपयुक्त पुस्तके नहीं थीं । वे विषय थे भारतवर्ष का भाषा-विज्ञान, हिंदी भाषा और साहित्य का इतिहासा, और, साहित्यिक आलोचना । इन तीनों विषयों के लिये अनेक पुस्तकों के नामों का निर्देश कर दिया गया जिनकी विषयो का पठन-पाठन हो सके; परंतु आधार. स्वरूप कोई मुख्य ग्रंथ न बताया जा सका । सब से पहले मैंने साहित्यिक आलोचना का विषय चुना और उसके लिये जिन पुस्तकों का निर्देश किया गया था, उन्हें देखना आरंभ किया। मुझे शीघ्र ही अनुभव हुआ कि इस विषय का भली भांति अध्ययन करने के लिये यह आवश्यक है कि विद्यार्थियों को पहले आलोचना के तस्वो का आरंभिक भान करा दिया जाय । इसके लिये मैंने सामग्री एकत्र करना आरंभ किया और संपूर्ण ग्रंथ के परिच्छेदों का क्रम, विषव का विभाग आदि अपने मन में बनाकर उसे लिखना आरंभ किया। वर मैं लिखता जाना था और उधर उसको पढ़ाता जाता था। इससे लाभ यह था कि मुझे साथ ही साथ इस बात का अनुभव होता जाता था कि इन
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