९१ कषिता का विवेचन "हूँ मुलगति कोउ बिता कहूँ कोउ जाति कुनाई। एक लगाई जाति एक को राख माई ॥ विविध रंग की उति वाल दुर्गधनि महति । महुँ घरी सो घटवटाति हूँ वादा वसति ॥ कहुँ फूकन हित धरयो मृत्तक मुराद तहँ आगो । पायो मग अजयो कहूँ कोऊ करसायो । कई स्थान एक अस्पिखंड के पाटि चित्रोरत । कई सारी महि काम टोर सौ ठोंकि स्टोरत ॥ कहुँ शृगाल कोउ सुतक अंग पर ताछ लगावत । कहुँ कोट शव पर बैठि गिढ़, पट चोच बळाचन ॥ जाई गई माया मांस मंदिर लरिम परन शारे । जिन तित टिके द्वाड स्खेत कई कहुँ रतनारे । हरहरात हक दिस पीपल को पेड़ पुरातन । छटकत जाम थंट बने साटी के चासन। जो कनु के काज औरहू लगन सरिता बनि संग फरारे गिरत अचानक ।। मंजक हूँ शिली शनकार । र मवली कई अमंगल मंत्र उचा।" देखिए वाया दोनवयाल गिरि ने चंद्रमा पर कैसो अच्छी अभ्योकि कही है- "मेलो मग धारे जगत नाम कर्शकी जाय। तक कियो न मयंक तुम सरनागढ को त्याग ।। अन्दानका
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