९५ कविता का विवेचन अनुकूल सामग्री उपस्थित होगी और जहाँ कपि को अपनी कल्पना उत्तेजित करने तथा उस कल्पना को खेलने कवने का पूरा अषकाश मिल सकेगा। इससे यह सिद्धांत निकलता है कि कषि जितना बड़ा होगा, वह उत्तप्ता हो गंभीर विचार करते- बाला, तत्वक या शाशनिक होगा। अतपय जितने नए विचार संसार में उत्पन होंगे या जितनी नई वैज्ञानिक नोज होगी, सम उसके लिये आवश्यक और मनोमुग्धवारी होगी। सबका प्रभाव उस पर पड़ेगा और सबको वह अपने सांचे में पालने का उद्योग करंगा। मनुष्यों की आशाओं, मनोरथों, उद्देश्यों आदि पर. इन विचारों या थोजों का भला-बुराजो कुछ प्रभाव पड़ेगा, सच पर उसका ध्यान जायगा और चाहे वह अपनी कविता में उनका प्रत्यक्षा उल्लेख न करे, पर फिर भी उसकी कविता किसी न किसी ओर सूक्ष्म से सूक्ष्म रीति पर उनसे प्रभावित हुए बिना न रह सकेगी। अतएव यह कहना कि विज्ञान की परतों से कवि का संबंध नहीं है, उचित नहीं है। वह उसके व्यापक प्रभाष से बच नहीं सकता। यहि कवि वार्शनिक विचारों का मनुष्य हुआ, तो वह विमान को बातों का विरोध किये बिना न रह सकेगा। आजकल जव कि नित्य नए आविष्कार और अनुसंधान हो रहे हैं और विचारों का बवंडर सा चल रहा है, कविता और विज्ञान में यदि कुछ विरोध देख पड़े तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। विचारों के विकास में मनोवेग बुद्धि के साथ साथ नहीं बने रहते। ये पीछे रह जाते हैं।
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