साहित्यालोचन १०० विपिन बीच विहंगन र का कल निनार विवर्षित था हुमा । ध्वनिमयी विविध विष्टगावली उड़ रही नभमंगल मय थी। अधिक और दुई नभ-लासिका दश दिमा अनुरंजन की गई। स-पादप-पुन- हनिमा अमिमा विनिमजित सी हुई ।। जलकने मिनी पर भी लगी गगन के माल की यह हादिया। लिभी सर के में ही अरणता शति ही रमणीय घो।" इस प्रकार के वर्णन में ध्यान देने की रात इतनी ही है कि कचि को प्रकृति का जैसा रूप दिखाई दे रहा हो. उसे यह वैसा ही अपनी भाषा में चिश्चित करे, उसे अपने भाषी और विचारों से रंजित करने का ध्यान न रहे और न वह उससे किसी प्रकार के सिद्धांत या उपदेश निकालने का उद्योग कर। ऐसे पर्पन बहुत कम देखने में आते हैं। इनसे आनंद का उद्रेक प्रतिषिवित होकर नहीं उत्पन्न होता, किंतु वह सीधे, बिना किसी आधार था आश्रय के. उत्पन्न होता है। दूसरे प्रकार के कवि प्रकृति से यह आनंप पाने के इच्छुक होते हैं जो उन्हें इंद्रियों द्वारा प्राप्त हो सकता है। ऐसे कवियों
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