कविता का. विवेचन को प्रकृति की ओर आध्यास्मिक या गूत भावनाओं से देखने को आवश्यकता नहीं होती। उन्हें उन भावनाओं से कोई प्रयोजन नहीं होता जो किसी चितनशील आत्मा को वस्तुओं का बाम रूप देखकर उसमें अंतर्हित भावों के विचार से उम्पन्न होती हैं। उन्हें तो प्राकृतिक सुंदरता का अनुभव करने भर से ही आनंद मिलता है और उसे प्रदर्शित करने में ही वे अपना कर्तव्य- पालन समझते हैं। प्रियवास में पंडित अयोध्यासिंह उपाध्याय ते पेसा वर्णन दिया है- "सोनी लोनी सकल एतिका यात्रु ये मंर बोली । प्यारी प्यारी ललित लहरं भानुना में जिरानी । माने की सी कलित किरण मंदिनी धार टूटी। कूलों, कुत्री, सुमित बनी, क्यारियों व्याति कैसी ।" उत्तररामचरित में लष का वर्णन मो इसी प्रकार का है- "किवि के कारण सों far पानग अप अनूपम मोहे। गुजान सिननि को धन के अग कोनि मलु फोरत नाहै। यंत्रात पंत्र-सिम्वनि किये बरमावत सेन में पान मिमीहै । पर रह्यो रंग साक्ष यत बालक बीर अताबहु का है।" तीसरे प्रकार के कवि वे हैं जो कविता में प्रकृति के नाना रन
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