कविता का विवेचन प्रकृति के प्रयोग का पाँचवाँ प्रकार यह है जिसमें केवल प्राकृतिक पश्य का वर्णन ही मुख्य विषय होता है। इसमें वष्ट सहायक या साधक का स्थान न प्रहण करके स्वयं मुख्य या प्रधान स्थान ग्रहण करता है और उसमें मनुष्य आदि का वर्णा केवल प्रकृति के चित्र को पूर्ण करने के लिये दिया मासा है। ऐसे माइतिक वर्णनों में तुओं का वर्णम या धनस्थली आदि का वर्णन गिनाया जा सकता है। हिंदी में षट् पातुओं के वर्णन बहुत अधिक हैं परंतु उनमें ऋतुओं का वर्णन करने की अपेक्षा गायक या नायिका के भाषों को प्रदर्शित करने का ही विशेष उद्योग किया गया है, प्रकृति को छटा प्रदर्शित करने की ओर चहुत कम ध्यान विश गया है। इनके अतिरिक्त कषि की प्रकृति का वर्णन बहुत कुष्ठ मनो- वृत्तियों, भावनाओ या विचारों पर निर्भर रहता है। कहीं तो वह उसमें श्विर के अनिवार्य नियमों का अनुभव करता है, कहीं बह उसमे क्रूरता, असहिष्णुता. कठोरता आदि का प्रत्यक्ष दर्शन करता है और कहीं उसमै सहानुभूति, सहकारिता और आध्यात्मिकता के तत्वों का साक्षात् रूप देखता है। प्रकृति की ये मिन्न भिन्न भावनाएँ और रूप कवि के स्वभाव के आश्रित रहते हैं। सारांश यह कि यह प्रकृति में अपने स्वभाष का प्रति- चिंब ढूँढ़ता है और उसे उसी रूप में देखकर अपने मनोनुकूल उसका वर्णन करता है। अतएव यह सिशांत निकलता है कि कषिता में एक ऐसी
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