साहित्यालामाल चिक मात्र को कसौटी उस शक्ति का महत्व है जो यह जीधन के महत्वपूर्ण और स्थायो विषयों के वर्णन मैं ऐसी घरमुमो के वत मैं जिमका संघ हमारे विशेष अनुभव और अनुराग- विराम से होता है प्रदर्शित करती है। कविता भी एक कला है। अतएष उसकी परीक्षा भो उस कला के नैपुण्य और उपकार से ही होनी चाहिए। साथ ही यह यात मी ज्यान में रखनी चाहिए कि काव्य-फरला आत्मा की बराहा सूर्ति है। यह विचारों और भाषा को वाहक है और जिसमा ही यह आत्मा के विचारों और भावों को प्रकट करती है, उतना ही उसका महत्व बढ़ता है। इसका यह आशय नहीं कि कविता का उद्देश्य केवल आनंद का उन्क करना है।यह तो सभी कलाओं का उद्देश्य है, ओर कविता रसका आ- वाद नहीं ! हमारे कहने का तात्पर्य इतना हो है कि उस आनंद को मात्रा विषय को उपयुक्तता और उसके प्रतिपादन की रीति पर आश्रित रहती है। कुछ लोग कह बैठते हैं कि किसो कक्षा का आदर इसलिये होमा चाहिए कि वह एक कला है, स- लिये नहीं कि यह आनंद का उछेक करने में समर्थ होता है। ऐसे सिद्धांत का प्रतिपादन तो ये ही लोग करते हैं जिनमें कला- कौशल का नैपुण्य नाम मात्र को ही होता है, या होता ही नहीं। बड़े बड़े कवियों ने इस सिद्धांत को उपेक्षा को रष्टि से ही देखा । उन लोगों का तो यही कहना है कि कबिता जीयन से, जोधन की ओर जोवन के लिये है। इसीभाव को लेकर उन्होंने कषिता की है। जीवन का भाव समझने और उसकी व्याख्या
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