कविता का विवेचन भावात्मक कविता में, जैसा कि पहले कहा जा चुका है, कषि अपमी अंतरात्मा में प्रवेश करता है और बाहरी अरत को अपने अंतःकरण में ले जाकर अपने भाषों से रंजित करता है। पर पाखविषयात्मक ऋषिता में यह आप बाहरी जगत में जा मिलता है और वहीं से प्रेरित होकर अपनी कविता का विषय ढूँढता है। फिर यह उसे अपनी कला का उपादान बनाता है. और अपनी अंतरात्मा को जहाँ तक हो सकता है, उससे अलग रखता है। अपनी अंतरात्मा को अलग रखने से हमारा तास्पर्य कंबल यही है कि वह अपनी कविता-सृष्टि में अपने आपको उसी प्रकार छिपाए रहना है, जिस प्रकार जगभियंता जगदी- श्वर इस जगत में अपने आपको अदृश्य रखता है। उसका अनुभव प्रत्यक्ष न होकर परोक्ष रूप में होता है। बाश-विषया. त्मक कविता में कवि अंसहित रहता है, पर भावात्मक कविता मै वह मन्य हो जाता है। हमारे यहाँ इस प्रकार की कविता के दो विभाग किए गए - थन्य और दूसरा दृश्य । जिस कथा या कहानी आदि के सुनने से आनंद का उद्रेक होता है, उसे अन्य काव्य करते हैं। उसमें कवि स्वयं वका बनकर अपनी प्रतिपाद्य कथा कह चलता है। रश्य काय यह है जिसमें ऋषि स्वयं कुछ नहीं कहता जो कुछ उसे कहना होता है, उसे वह उस कथा के पात्रों से कहलाता है। पहले प्रकार की कविता के उदाहरण सलो, पदमावती, रामायण आदि है, और दूसरे प्रकार की कविता
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