कषिता का विवेचन मिपुणता के आदर्श होते हैं। रामायण और महाभारत इस प्रकार को कविता के खोत्तम उदाहरण हैं। इस प्रकार पाहा विषयात्मक कविता चार मुख्य उपभागों में विभक्त को जा सकती है-बोयर आख्यान, रूपक, गीता- रमक काश्य और महाकाव्य । इनमें से रूपकों के विषय में आगे चलकर विशेष रूप से लिखा जायगा। कचिंता की अंतरात्मा का विवेचन यहाँ समाप्त होना है। उसके वाहा रुप के साधनों के विषय में हम आने वरकर विशेष रूप से लिस्प्रेग ओर उंद, वृत्ति, रीति, अलंकार आदि का भी विवेचन करेंगे । यहाँ हम केवल इतना कह देना चाहते हैं कि हमारी भारतीय कविता में विशेष रूप से रसों के संघार का उद्देश्य हो सय कवियों के सामने रहा है और इसी के परि- पाक से कविता का महत्व स्थापित किया गया है। इस संबंध में कवियों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि किसी रस का इतनी अधिक मात्रा में संचार न हो कि पढ़नेवाले का मन उससे ऊब जाय, घबरा जाय या उद्रिय हो उठे। सुचार रुप से उसका प्रयोग यांसमीप है जिसमें वह वास्तव में अली- किक आनंद का उद्रेक कर सके। इस संबंध में विशेष ध्यान करण और हास्य रस का रखना चाहिए । करण की मात्रा इतनी अधिक न होनी चाहिए कि यह मम को विज्ञल करवे; और हास्य ऐसा न होना चाहिए जोअशिष्ट या अश्लीख जान पड़े। G
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