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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/१३५

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नाटक उपन्यास पाँचवाँ अध्याय गय-काव्य का विवंचन गय-काथ्य के अंतर्गत उपन्यास, कथा-कहानियाँ और निबंध विशेष रूप से आते हैं. अतपय इस अध्याय में इम इन्हीं के विषय में विचार करेंगे। हम पहले लिख चुके हैं कि मनुष्य एक ओर तो अपने भाषों या विचारों को दूसरों पर प्रकट करना चाहता है और सरी और अन्य मनुष्यों के जीपन, उनके कार्य, उनकी और भावनाओं, उनके हम-द्वेप, उनके सांसारिक बंधन आदि के जानने और समझने में एक प्रकार का अनु राग रयता है । यह भी एक मनायुक्ति का परिणाम है जिसे हम मानव व्यापार को अनुरूक्तिकह सकते हैं। इस मनोवृत्ति से प्रेरित होकर ऐसे काव्यों को रचना होती है जिनका उद्देश्य मनुष्यों का चरित्र-चित्रण होता है। इन्हीं प्रवृत्तियों से प्रेरित होकर भिन्न भित्र प्रकार के काव्यो, जैसे चीर काध्य, गीति काध्य, उपन्यास आदि की उत्पत्ति, सामाजिक तथा कलात्मक स्थिति के परिवर्तन- शील रूपों के अनुसार, होती है। नाटक और उपन्यास में बड़ा भारी भेद यह है कि नाटक का रूप रंगशाला के प्रतिबंधों के अनुसार बहुत कुछ स्थिर करना पड़ता है, अर्थात् यह नाटपकता और काव्य-कला का एक प्रकार का मिश्रण है। पर उपन्यास में